कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday 29 January 2012

प्रकृति और इंसान

दीवारों पर परछाँई के रूप में
बादलों में प्रतिबिम्ब की तरह,
अनेक प्रकार की आकृतियाँ
हम द्रष्टिगत करते हैं।
पर क्या,
कभी सोचा है कि यह बादलों में
चित्र का रूप भयानक क्यूँ है,
एकाएक जवाब मिला कि
वहाँ भी इंसानों की परछाँई पड़ गई है।
चमकती हुई बिजली
जब हमें आतंकित करती है,उस वक्त,
वह हमारी ही जलन की
रोशनी होती है।
आँधी आती है और सब कुछ
नष्ट हो जाता है,
यह आँधी भी कोई पराई नहीं-
बल्कि मानवीय उच्च आकांक्षाओं की होड़ में,
अप्राप्य चित्त की मात्र अभिव्यक्ति है।
परेशान होते हैं सब उस वक्त
जब आता है भूकम्प,जबकि
समाज की कुण्ठित पीढ़ी प्रतिदिन
एक भूकम्प से ही गुजरती है।
जिये जा रहे हैं कि अब प्रकृति भी
रुख बदलने लगी है। काश!
कि सोचा होता वो आज भी वही है,
कुछ बदला है तो इंसान
और सिर्फ़ इंसान…

जुलाई 31, 2011

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