कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Tuesday 31 January 2012

सर्द दोपहर में


सर्द दोपहर में,बालकनी का वो कोना
जहाँ सूरज अपना छोटा सा
घर बनाता है,अच्छा लगता है।
हर’पहर’के साथ
खिसकता हुआ वो घर,जीवन पथ पर
चलना सिखाता है।
हो कितनी ही ठण्ड,पर उसकी गर्म सेंक
सुकून देती है।
है जीवन भी ऐसा,कभी सर्द तो कभी गर्म
हर कोने की सर्दी को सेंक देना है,
हर गर्म घर को शीतल कर देना है।
वो सूरज की किरणों का छोटा सा घर
सब की बालकनी में,एक कोना सा है…
जनवरी 10, 2012

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