कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Thursday 9 February 2012

तुमसा न कोई

न मिला कोई तुम सा,पहले कभी
धड़कता है दिल पर धड़कन रुकी
जज़बात हैं यूँ सारे लफ्ज़ों मैं कैद
मिलेंगें जब हम,थम जायेगी घड़ी
वो सोचना तुम्हे यूँ भाने लगा
है तारों की दिल मे,वीणा बजी
अंगार से लब यूँ ग़रम हो गए
आँखों की चिलमन है खुद पे गड़ी
न ही सुनना है कुछ,न ही कहना तुमसे
ख़ामोशी भी दास्ताँ सुनाने लगी
तुम्हे हो तो हो,न हमें ये ख़बर
क्यूँ दिल की हर धड़कन तुम्हारी लगी।

Tuesday 7 February 2012

जब भी होते खुश बहुत तुम

जब भी होते खुश बहुत तुम
मिलता अजब सुकूं सा हमको
पर देख तुम्हें परेशाँ कभी
दिल का हर कोना दुखता है
बस एक यही तो  न चाहा था।
बरसों बीते ये साथ न छूटा
अरमा बिखरे विश्वास न टूटा
हाँ हिस्से के सुख तु्म्हे न मिले
जब भी सोचा ये न चाहा था।
है उलझा जीवन,हो उलझन में तुम
सिलवट सा जीवन सोचा न था
दर्द तुम्हारे,हैं छलनी करते
चुभ-चुभ कर सीने को सदा हमारे
दिल है रोता सोच-सोच कर
तुम नाखुश हो,चाहा न था।
इक मुस्कान तुम्हारी अपनी,
लगे नए जीवन की ओढ़नी
सिवाय तुम्हारी खुशियों के बस
और कभी कुछ चाहा न था
जब भी होते खुश,हो बहत तुम
मिलता एक सुकूं सा हमको
जीवन में बस,यही चाहा था।