कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Friday 3 February 2012

रात के जज़बात


सदा तुम्हारा इंतज़ार क्यूँ रहता
वज़ूद क्या नहीं, कोई मेरा
माना कि तुम हो उजली साफ
तो क्या? जीवन नहीं घनेरा
हर आशा को सदा,तुझसे ही
जोड़ा जाता,जबकि
निराश और थके आते हैं सब
सदा,मेरी बाँहों में समाते हैं सब।
समझती उन्हे और हौसला भी भरती
चूम पलकों को झट आगोश में लेती
फिर भी कहते हैं लोग,फ़िक्र न कर
कट जाएगी रात—
आएगी सुबह,ले नई सौगात।
नई सोच को बल,सदा मुझसे
ही मिलता….
न मुझे कोई देखता,न कोई सराहता
जबकि हर जिस्म में,
ऊर्जा भरती हूँ मैं
थपकी मीठी नींद की,उमंग भरती हूँ मैं
हूँ ख़ास तो बहुत, फिर भी…..
क्यूँ रहता सदा तेरा इंतज़ार।
(रात के सवाल हैं सुबह से कुछ ख़ास)

Wednesday 1 February 2012

शायराना अंदाज़-12

“आज बात करने का दिल ही नहीं
ख़ुदा के लिये,न मजबूर कीजिए
अभी टूटा है दिल,सम्भाल तो लूं
फिर चाहे जितने ही ज़ख्म दीजिए”

Tuesday 31 January 2012

गणतंत्र दिवस-तिरसठ वर्ष


पूरे हुए तिरसठ वर्ष आज
हमारी ज़िंदगी के
वो वर्ष,जिनमें साँसें ली हमने
स्वेच्छा से
हर चीज़ है पाई अपनी
इच्छा से।
इन वर्षों में,हम
जिये हैं स्वतंत्रता से
ये निधि है,जो रखनी है
सम्भाल कर
मिली है हमें अपने
दादा-पुरखों से।
उनके खून से सनी न जाने
कितनी गलियाँ
और आहों से भरी हजारों
मुरझाई कलियाँ,
आज नज़र आती हैं हमें।
इन वर्षों में बहुत कुछ
बदल सा गया है..
आज अपने ही पराये के
बागीचे में जा खड़े हैं
क्या यही हमारी नैतिकता के धागे हैं?
ज़रा सी चोट लगी और टूट गए..
इन धागों में लगी,हजारों गाठें
अलग-अलग कर देती हैं एक-एक को
यदि इन गाँठों को हम हटा सकें
थोड़ी भी मानवता ला सकें
जिससे-
आने वालों को इंसानियत सिखा सकें,
बता सकें उन्हे कि देश है क्या
और वतन क्या!
क़ैद का मतलब है क्या,और
आजादी की परिभाषा क्या
यदि,ये अनुभव हम करा सकें
इन नौनिहालों को,तभी
कह सकेंगे कि हाँ..
पूरे किये हमने तिरसठ वर्ष आज
हमारी ज़िंदगी के।
जनवरी 25, 2012 

शायराना अंदाज़-11

“ख़ता ये हुई,तुम्हे खुद सा समझ बैठे
जबकि,तुम तो…
‘तुम’ ही थे”
जनवरी 20, 2012

दूर-पास का फ़र्क

दूर रहता जो सदा वही भाता
पास की निगाह कमज़ोर क्यों होती
दूर की हँसी की,दिल में गूँज उठती
पास का दर्द नज़र अंदाज़ हो जाता।
दूर के अल्फ़ाज़ भी मिश्री से घुलते,
पास की मासूमियत पे सदा शक आता।
रिश्ते तो रिश्ते हैं,होते सदा’रिश्ते’ही
फिर क्यूँ दूर-पास का फर्क नज़र आता।
जनवरी 18, 2012 

शायर का पैगाम,शायरी के लिये

शायराना सा हो रहा आज दिल मेरा
डर लगता है कहीं,हो न जाए ख़ता
कल होगा मिलन फिर हमारा तुम्हारा
आशा है नयी,मिल जाएगा किनारा।
सोचता हूँ कौन से रंग में दिखोगी तुम
बेख़बर,मेरे रंग में रंगी हो तुम
पर फिर भी नीला रंग,सदा तुम पे भाता
वो बात है अलग,निगाह आँखों से न हटा पाता।
खनक तेरे लबों की,यूँ पास मेरे गूँजती
वो झुकी पलकों की डोर मुझे खीँचती
कट जाए ये रात,आ जाए सवेरा
जनवरी 15, 2012 

फासला उम्र का

फासला उम्र का दिख जाता है बस यूँ ही
विचारों के फासले की उम्र नहीं दिखती
फिर भी सदा उम्र से विचारों को आँका जाता,
क्या अधिक उम्र से ही,जीवन दिख पाता?
सच है कि अनुभव सब सिखा जाता
हम सीखे हैं कितना,ये कौन जान पाता।
सीखने की चाह ही सदा जीत पाती
सोच का है फेर बस,समझ यही आता
विचारों की नदिया यूँ बहने को होती
किसी को माँझीं,किसी को मँझधार नज़र आता।
फासला उम्र का सदा दिख जाता…
जनवरी 13, 2012

सर्द दोपहर में


सर्द दोपहर में,बालकनी का वो कोना
जहाँ सूरज अपना छोटा सा
घर बनाता है,अच्छा लगता है।
हर’पहर’के साथ
खिसकता हुआ वो घर,जीवन पथ पर
चलना सिखाता है।
हो कितनी ही ठण्ड,पर उसकी गर्म सेंक
सुकून देती है।
है जीवन भी ऐसा,कभी सर्द तो कभी गर्म
हर कोने की सर्दी को सेंक देना है,
हर गर्म घर को शीतल कर देना है।
वो सूरज की किरणों का छोटा सा घर
सब की बालकनी में,एक कोना सा है…
जनवरी 10, 2012

निश्छल प्रेम


रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती।
झट सन्देसा ले कोई आ ही जाता
कैसी हो बिटिया,बड़ा समय काटा।
काकी हैं बूढ़ी़, न चल फिर पातीं
फिर भी अपने हाँथों से पेड़े बनातीं
खाकर उन पेड़ों का अमृत सा स्वाद
नम आँखों से आती,फिर काकी की याद।
साँझ तक बिटिया,मिलने आना ज़रूर
काकी हैं बूढ़ी़ फिर मिलें न मिलें!
तुम्हारी पसंद की बनवाई है ‘रस खीर’
आ कलेजे से लगो,चाहे यही तकदीर।
देख ये निश्छल प्रेम का नाता,
खुद में हीन,काकी पे गर्व आता
हर एक गाँव में हैं कितनी ही काकी
जला रखी है जिन्होंने निश्छल प्रेम  की बाती।
रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती… 

जनवरी 7, 2012  

शायराना अंदाज़-10

“इंतज़ार उनका,कुछ हुआ इस तरह
हो बेचैन रूह भी मचलने लगी,
हर लम्हे पे टिकी थी बेसब्र नज़र
हुआ हमें ,उन्हें दिललगी लगी।”
जनवरी 5, 2012 

स्वागत नव वर्ष का


नव वर्ष लेकर आ रहा
मन में नया सा हर्ष,
कैसे करें और क्या भला
छिड़ रहा यही संघर्ष।
दिल खुशी से झूमता,
स्वागत को ये आतुर
चहुँ ओर फैले नव किरण
चाहे यही दिवाकर।
सब का जीवन जगमगाए
नव ज्योति सा पावन
हो चाहतें भी सारी पूरी
न बचे कोई चुभन।
आओ मन में ठान लें अब
लें नया संकल्प,
सदभावना हो सबके लिए
न कोई और विकल्प।
नव वर्ष यूँ ही आएंगें
ले नित नये दिनमान
छोड़कर अभिमान हमें
रखना है सबका मान।
ह्रदय द्वार है खोलकर
करते हम स्वीकार
नव वर्ष आपके जीवन में
ले आए खुशियाँ अपार।
नये वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाओं एवं बीते वर्ष की मधु स्मृतियों के साथ आप सभी की,
इंदु     
दिसम्बर 30, 2011

घना कोहरा

जब भी दिखता है घना कोहरा
यूँ लगता है जीवन का रूप दिख गया
घना है बहुत, पर साफ भी बहुत
न छुपने छुपाने को कुछ रह गया।
दूर से लगे, न कुछ दिख रहा
गर घुसते चलें तो वो छँट भी रहा
कभी लगे घना कभी बहुत गहन
फिर भी है उसे,चीरती सूरज की किरण
होता अपने चरम पर, फिर भी ख़त्म होता
पार करना उसे यूँ न आसान होता
फिर भी धीरे- धीरे सब करते ही जाते
जीवन से कोहरे को हटाते ही जाते
है बड़ा ही ढीठ,आ जाता बार-बार
जीवन भी अडिग,सहता कोहरे का प्रहार
भर कर नया हौसला बढ़ते ही जाना है
हर एक के जीवन से,कोहरे को मिटाना है।
दिसम्बर 26, 2011 

सैन्टा तुम आना ज़रूर

सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
ठण्ड से कहना,कि आए थोड़ा हौले
कई बच्चे-बूढ़े हैं सड़कों पे फैले
रात की गर्म चादर,है न उनके करीब
भर लाना अपनी झोली में उनका नसीब।
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
सूरज से कहना न इतना सताये
ले आना चन्द किरणे तुम उनके   लिये
जो आँखों से कभी न,जीवन देख पाये
सजा देना उन आँखों में,मीठे सपनों का नूर
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
हैं कितने ही अन्जान,जीवन के सुख से
भर देना उन सबमें, जीने का जुनून
गर आसां नहीं है तो मुश्किल न कहना
भर लाना अपनी झोली में,हौसला भरपूर
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
दिसम्बर 21, 2011

एक ख़्वाब जिसे मन नहीं समझ रहा

अलसाई हुई आँखों में
एक अक्स उभरता है
देखने पर ध्यान से
वो अर्श ठहरता है
फिर बोझिल सी आँखें
कुछ खुली कुछ मुँदी
स्मृति पटल पर कोई
ख़याल नहीं घूमता।
आख़िर कौन है यह,जिसे
मन नहीं समझ रहा
तमाम कोशिशों पर भी ये
नहीं पिघल रहा
तभी एक सिहरन सी और
आँख कुछ खुली
नज़र गई सीधे अर्श पर
चेहरा न था वहाँ कोई
वो अमावस की रात थी,
नहीं सौगात कोई।
दिसम्बर 19, 2011

शायराना अंदाज़-9

“तन्हाइयों की आदत अब हो गई हमें
तुम्हारा पास आना,अब भाता नहीं
यूं फैले हमारी चाहतों के फासले,
अब किसी चाहत से,कोई नाता नहीं”
दिसम्बर 17, 2011 

Monday 30 January 2012

मुमकिन होता नहीं

चाहे कोई आपको,आपकी तरह
मुमकिन होता नहीं
सुने अनकहे लफ़्ज़ों के जज़बात
मुमकिन होता नहीं
क्यूँ नहीं ये ज़िंदगी,उन्हें उन से मिलाती
जो पूरे कर सके सारे ख़्वाब
मुश्किल तो नहीं,फिर भी
मुमकिन होता नहीं
न परवाह है कोई,कि चाहे कोई क्या
जब दर्द उठे दिल में,फिर चुप रहना
मुमकिन होता नहीं
शिकायतों का दौर थमता नहीं
फिर भी उसे बयाँ करना
मुमकिन होता नहीं
गहरी सूनी आँखे न जाने क्या-क्या खोजतीं
फिर उन्हे सूखा रख पाना
मुमकिन होता नहीं
गज़ब है ये ज़िंदगी,गज़ब हैं ये चाहते
इनके बिन भी जीना
मुमकिन होता नहीं
ठीक उस तरह जैसे रात के बिना
सुबह का आना
मुमकिन होता नहीं।

Sunday 29 January 2012

सुबह के लिए

रात गहरी नींद आई,तुम्हारी मीठी याद में
खुलेगी जब आँख,तुम गले लगाओगी हमें
कैसे हर रोज़ नया रूप धर लेती हो तुम
हो रात कितनी ही घनेरी,मंद कर देती हो तुम।
रात यूँ ख़ामोश जितने ख़्वाब हम जीते रहे
सब को पूरा करने का,हौसला भर देती हो तुम।
गहन अंधकार में,होती हैं जब आँख बंद
चुपके से यँ चूम कर,रौशनी भर देती हो तुम।
हो बला की ख़ूबसूरत,न इसका कोई है जवाब
इतज़ार करते हर दिल में,उमंग भर देती हो तुम।
हर दिन नया है जीवन,हर दिन नई है शुरुवात
गले लगा के रोज़ यूँ,जीवन बदल देती हो तुम…
दिसम्बर 14, 2011

प्यार एक भ्रम है


प्यार एक मात्र भ्रम है इससे अधिक कुछ नहीं,हाँ सभी को इसका अलग-अलग ग़ुमां ज़रूर होता है। कोई प्यार में बावरा हुआ जाता है कोई प्यार में खुद को तलाशता है। प्यार भी एक बार नहीं बार-बार होता है क्योंकि भ्रम जीवन में अनेकानेक बार होते ही हैं,या यूँ कह लें कि जीवन स्वयं ही भ्रम है तो भी कुछ अधिक न होगा। प्यार में जीने-मरने वाले भरे पड़े हैं और उन्हें आप गलत भी नहीं ठहरा सकते क्योंकि यही तो उनका भ्रम है और वो इससे ग्रसित। प्यार से बड़ा वायरस आज तक नहीं फैला जो दिखता तो नहीं लेकिन आपको कब डस लेता है आप समझ ही नहीं पाते। आप सही गलत सब प्यार की नज़र से देखते हैं और यही भ्रम आपको खोखला करता चला जाता है,पूरी तरह।
भ्रम हुआ,कि प्यार हुआ किंतु यही यदि दूसरे को नहीं हुआ तो भी मन दुखी और यदि हो गया तो फिर उसकी शिकायतों से दुखी। प्यार में यदि एक गुलाब भी मिला,दिल में पूरी क्यारी खिल जाती है और यदि नहीं तो बबूल के कांटे सीने पे बिछ जाते हैं। गज़ब का है ये भ्रम जो लोगों को कभी हँसाता-कभी रुलाता बल्कि एक कठपुतली सा नचाता है।
‘हमें तुमसे प्यार है,तुम न मिले हम जी न सकेंगे’ पर फिर भी जीते हैं और यदि तुम मिल गए तो पूरा जीवन कोसेंगे कि इससे तो बेहतर था हम मिलते ही नहीं,एक भ्रम तो रहता कि हम मिल न सके। प्रेम रूपी वायरस पहले आपको मज़बूत बनाने का भ्रम दिखाता है फिर धीरे-धीरे आपको अपने अधीन कर कमज़ोर करता जाता हैऔर आप फिर भी उसी भ्रम के पीछे भागते रहते हैं जिसका कोई अंत नहीं कोई वजूद नहीं। ‘प्यार बाँटते चलो’गाना सुनना अच्छा तो लगता है किंतु यथार्थ के धरातल पर सच्चाई से बहुत दूर क्योंकि किसी को भ्रमित करने से बेहतर होगा कि ‘ज़िंदगी जीते चलो’की तर्ज़ पर ही लोगों का हौसला बढ़ाया जाए।
“ऐ ज़िंदगी तेरे ग़म से डर लगता नहीं अब
बस ख़ुदा के लिए हमसे ‘प्यार’ मत करना।”दिसम्बर 11, 2011

शायराना अंदाज़-8

“कितना आसां है कहना,कि सब कह दिया
जबकि कहना था जो,कह न सके
कितना आसां है कहना,हमने समझ लिया
जबकि समझने को कुछ था ही नहीं।”
दिसम्बर 10, 2011

मन की उलझन

कभी सोचता है उलझनों में घिरा मन
क्या ठहर गया है वक्त ? नहीं,
वक्त वैसे ही भाग रहा है
कुछ ठहरा है तो वो है मन,
मन ही कर देता है कम
अपनी गति को
और करता है महसूस
ठहरे हुए वक्त को
उसे नज़र आती हैं सारी
जिज्ञासायें उसी वक्त में,सारी
निराशायें उसी वक्त में
पर ठहरा हुआ मन अचानक-
हो उठता है चंचल मृगशावक सा
और करता है पीछा उस वक्त का,
जो बीत गया है।
नहीं चल पाता जब वक्त के साथ
सोचता है तब उसका
ठहरा हुआ मन,कि ये ठहराव
वक़्त का नहीं
ये तो है सिर्फ़ मन की उलझन।
दिसम्बर 7, 2011

शायराना अंदाज़-7

“वो ठण्डी हवा के साथ कुछ बूँदें बारिश की
अलसाई हुई रात, सजी है दु्ल्हन सी
वो तसव्वुर में उतरा एक चेहरा,
जो समाया है मन में,कहीं दिखा तो नहीं।”
दिसम्बर 5, 2011 

तन्हा सा दिल

जब-जब भी दिल,है दुखा कभी
संग हमारे सदा तन्हाई ही रही
आँसू बहने को आतुर,रुक जाते हैं
न पोछेगा कोई,खुद ही सिमट जाते हैं
है मन यूं परेशां,व्यथा से भरा
लगे मुसीबतों का है तम सा घिरा
न कोई सहारा न उजली किरण
बेचैन दिल है,पीड़ित ये मन
है खुद को समझना व समझाना भी
न आएगा पास,कोई हमदम कभी
दुखा है दिल तो क्या हो गया
भूल कर इसे मुस्कुरा बेवजह
सब आएंगे तेरे पास फिर ज़रूर
ले-ले के अपने ग़मों का सुरूर
बन जाएंगे हम फिर सबके लिए
दुख-दर्द बाँटने का ज़रिया हुज़ूर…
नवम्बर 28, 2011

शायराना अंदाज़-6

“न मिल कर सुकूं
न दूर जा कर ही,
इससे तो बेहतर था
बस ख़यालों में रहना”
नवम्बर 28, 2011

अजब है जीवन

अजब है जीवन अजब है रूप
हर दिन नई सीख,नया ही स्वरूप
आज जो सोचा,वो था कुछ अलग
पर क्या था न कहने की चाह है अब।
हजारों सवालों का न कोई जवाब
हर जवाब में छुपा इक नया ही सवाल
बेचारियत पे इनकी है किसको रहम
खुद ही उठते गिरते लड़खड़ाते कदम
कभी चाहे उड़ना कभी बस मिटना
जीवन के रूपों की न बात कोई करना।
हैं पल में ये सुंदर तो पल में कुरूप
जीवन समझने की न चाह कभी रखना
हर दिन हर पल,हर साँस है नई
हर साँस में बदलता है जीवन का रूप।
है सभी का ये जीवन,फिर भी है क्यों अलग
हर शख़्स यहाँ रखता है,अनेकों स्वरूप।
नवम्बर 24, 2011

जीवन की घुटन

भरी है जीवन में इतनी घुटन
रहा रिश्तों में उलझा,सदा ही मन
तलाशता रहा प्यार का दामन
न वफ़ा ही मिली,न कोई हमदम।
सूनी रातों में फिर टूटा तारा कहीं
लगा यूं मिल जाएगा किनारा कहीं
चाहूं संग उसका, अब हर घड़ी
पर उलझनें हैं फिर भी साथ में खड़ी।
सब रिश्तों से मिलती,है क्यूं चुभन
कभी खुल के जीने को तरसे ये मन
क्यूं भरी है जीवन में इतनी घुटन…
नवम्बर 22, 2011

क्यों कि हर एक पल ज़रूरी होता है

15.11.2011
रोचक विषय कि यदि आपको 2 घंटे अतिरिक्त मिल जायें तो आप क्या करेंगें। पिछले कई दिनों से यही सोच रहे हैं कि आखिर करेंगें क्या? क्योंकि जबतक आपको कोई चीज़ न मिले आपकी चाहत,उत्सुकता सब बरकरार रहती है और आप ये भी सोचते हैं कि हम ये करेंगे,ऐसा होगा आदि-आदि किंतु जब आपको चाहा मिल जाता है तो सच है कि कई बार समझ ही नहीं आता कि हमें करना क्या है और कुछ ऐसा ही ऑफर है ये। सच कहे तो अच्छी अनुभूति है जो चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेर रही है और साथ ही स्वयं से पूछताछ भी चल रही है कि वाकई हम करेंगें क्या??? यही सोच कर आज….टिंगं टॉंग-टिंगं टॉंग..,शायद कोई आया है अतः लेखनी को यहीं अर्ध विराम दे रही हूँ!
16.11.2011
आज दूसरा दिन है और कोशिश है कि दिल से कुछ लिख सकूं। यूँ तो हमें कविता लिखना बहुत पसंद है खासकर जब हम खुश हों,परेशान हों,उदास हों या दुखी या कोई और इन पलों से गुज़र रहा हो । उस वक्त ह्रदय के भाव स्वतः ही शब्द रूप धर मुखर हो उठते हैं चाहे कितनी ही थकान हो या तनाव, लिखने के बाद सब छू मंतर हो जाता है। जीवन की भागदौड़ में समयाभाव सभी को सताता है क्यों कि अधिकाधिक कार्यों को करना,समय सदा कम ही लगता है। जब चाहे जो आज़मा ले अनेकानेक सवालों का जवाब एक ही मिलेगा कि “समय ही नहीं मिलता” जीवन की व्यस्तताओं में सभी जकड़े हुए हैं। ऐसे में यदि हमें पूरे 2घंटे अधिक मिल जाएं तो यकीन जानिए ये किसी लॉटरी निकलने से कम नहीं होगा। हमारा मानना है कि’समय ही समय है समय का’। यदि आप हमें अतिरिक्त दो घंटे दे हे हैं,वह समय हम अपनी लेखनी के लिए ही चुनेंगें क्यों कि जीवन में सारी ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए यदि कभी…टिंगं टॉंग-टिंगं टॉंग..,शायद कोई फिर आया है दरवाज़े की घंटी पुनः बज ही गई..
17.11.2011
यदि कभी समय की कमी महसूस होती है तो वह अपने लेखन के प्रति। अतः शायद नहीं,यकीनन यदि हमें दो घंटे अतिरिक्त मिल सकें तो वो समय हमारे लेखन या पठन के लिए ही होगा। ये पोस्ट हमने तीन दिन में पूरी की है जब कि लिखा कुछ खास नहीं है बस अपने समयाभाव को दर्शाया है जो कि स्वतः ही दिख रहा है परंतु अतिरिक्त दो घंटे मिलने के अनुभव मात्र से जो खुशी हो रही है उसके लिए ‘सर्फ ऐक्सल’ का दिल से धन्यवाद।
नवम्बर 16, 2011 

शायराना अंदाज़-5

“इश्क ने किया बेबस हमें इतना
न ख़बर हो तेरी,सुकूं मिलता ही नहीं
हौसलाए ख़्वाहिशों का आलम न पूछो
बिन तेरे दीदार,दिल लगता न कहीं”
नवम्बर 15, 2011

बाल-दिवस

सोंधी माटी की खुशबू सा
होता प्यारा बचपन
नई अदाएं नये तरीके
अनोखा होता हर दिन
फूलों की खुशबू मंद बयार
चिड़ियों की कलकल है अपार
मधु स्मृतियों के बीच पनपता
हर पल चलता बचपन
कभी शैतानी कभी शिकायत
कभी हंसी का मधुबन
मासूम अदाएँ हर पल करती
नव जीवन-नव दर्पण
लाख मुसीबत लाख हो उलझन
पल में यूँ है गायब होती
जब भी चाहे आजमा लो
बस पढ़ लो ये बाल मन
चाचा नेहरू ने भी पढ़ा था
है अद्भुत ये बचपन
बाल दिवस पर हम सब करते
हैं उनको श्रद्धेय नमन…
नवम्बर 13, 2011

पडिंत जवाहर लाल नेहरू पत्रों के आइने में

14 नवंबर पं जवाहर लाल नेहरू का जन्म दिन है जो बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री चाचा नेहरू प्रखर स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे अपितु एक ऐसे महा मानव थे जो सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की चिंता करते थे। जिस समय भारत में स्वतंत्रता का आंदोलन चल रहा था पड़ोसी देश चीन की जनता भी आजादी के लिए छटपटा रही थी और वहाँ भी आजादी की जंग जारी थी। चीन की हालत भारत से भी खराब थी। जवाहर लाल जी उस समय से ही एक अन्तर्राष्ट्रीय हस्ती बन चुके थे और चीन की जनता की उन्होंनें आर्थिक मदद तक की थी। आगे चलकर अक्टूबर 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया तो नेहरू जी को इससे तगड़ा सदमा पहुँचा क्यों कि हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा नेहरू जी ने ही दिया था। इसी सदमे से उन्हें पक्षाघात हो गया था और 27 मई 1964 को वे चल बसे थे। चीन के तमाम नेताओं से उनका पत्र व्यवहार चला करता था-आजादी के पहले से। इन पत्रों के आइने में आज जवाहर लाल जी के विराट व्यक्तित्व को थोड़ा बहुत समझा जा सकता है क्योंकि सच बात तो यह है कि पत्र दिल खोल कर लिखे जाते हैं इनमें लिखने वाले का ह्रदय और वयक्तित्व बड़ी सच्चाई के सथ बोलले हैं। बनावट अथवा सजावटकी गुंजाइश नहीं होती। जवाहर लाल जी के इन पत्रों में उस युग की आत्मा ही सामने आ जाती है जब भारत अपनी आजादी के लिए पूरी ताकत से जूझ रहा था और अपने भविष्य का निर्माण कर रहा था। जवाहर लाल जी की चीन सम्बंधी नीतियों की लोग प्रायः आलोचना करते हैं पंरतु चीन से उनके सम्बंधों को इन पत्रों से थोड़ा बहुत समझा जा सकता है। कुछ पत्रों के उदाहरण इस प्रकार हैं-
1-
येगनेस स्मेड्ली की ओर से
जनरल हेडक्वार्टर्स
चाइनीज़ अर्थ रूट आर्मी (रेड आर्मी)
वेस्टर्न शान्सी प्राविन्स चीन
23 नवम्बर 1936
प्रिय श्री नेहरू
मैं आपको फिर एक आवश्यक कार्य के लिये पत्र लिख रही हूँ। जापान द्वारा अधिकृत प्रदशों में हजारों चीनी विद्यार्थियों मजदूरों और किसानों ने विद्रोह करके स्वयं सेवक दल बना लिया है और वे जापानियों से लड़ रहे हैं।
उनके पास हथियार हैं लेकिन न तो जाड़े में पहनने के कपड़े हैं न जूते और अक्सर कई दिनों तक उनके पास भोजन भी नहीं होता। यहाँ हमारी सेना बहुत गरीब है। उसके पास स्वयं सेवकों के लिए पैसे नहीं है….
क्या इंडियन नेशनल कांग्रेस चीनी स्वयं सेवकों के लिए कुछ रुपया दान कर सकती है? मैं इंडियन नेशनल कांग्रेस से अपील कर रही हूँ हमारे स्वयं सेवकों के लिए कुछ अवश्य भेजिए और अगर आप भेजें तो-”बैंक ऑफ चाइना,सिआन्फू शाखा,सिआन,चीन के नाम बैंक ड्राफ्ट बना कर नीचे लिखे पते पर भेजे। हम आप से अपील करते हैं कि आप चीनी जनता को दासता से लड़ने में सहायता दें।
भवदीया- स्मेडली
2-
चू तेह की ओर से
सदर मुकाम अर्थ रूट आर्मी
शान्सी चीन
26 नवम्बर 1937
प्रिय श्री नेहरू
हमने यहाँ के अखबारों में पढ़ा है कि आपने हमारे स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में हिंदुस्तान के कई नगरों में सार्वजिनक सभाएं की। अनुमति दीजिए कि मैं चीनी जनता और खास तौर से अर्थ रूट आर्मी (चीन की लाल सेना)की ओर से आपको धन्यवाद दूँ।
आक्रमण करने वाली शाही फौज के खिलाफ स्वयं सेवक दल बना कर लड़ रहे हैं इन स्वयं सेवकों के पास हथियार तो हैं लेकिन उनके पास न गर्म कपड़े हैं ,न कम्बल,न जूते। उनके पास खाने का सामान भी बहुत कम है या अक्सर होता ही नहीं।…आप ये जान ले कि आप द्वारा भेजे गये पैसे का हार्दिक स्वागत किया जाएगा और वह संघर्ष को जारी रखने में सहायता देगा। हम आप से प्रार्थना करते हैं कि आप इस सवाल पर पूरी गम्भीरता से विचार करें,हमारी सहायता के लिए अपना आन्दोलन और भी तेज कर दें जापानी सामाने बहिष्कार के आन्दोलन को और भी व्यापक तथा गहरा बना दें। हमारा संघर्ष आपका संघर्ष है।
आपने हमारे लिए अब तक जो कुछ किया है उसके लिए हमारी सेना एक बार फिर आपका हार्दिक धन्यवाद करती है।
आपका साथी-
चू तेह
कमांडर इन चीफ
अर्थ रुट आर्मी चीन
3-
माओत्से तुंग की ओर से
श्री ज.नेहरू
आनन्द भवन
इलाहाबाद (यू.पी.)
प्रिय मित्र,
डॉ.अटल के नेतृत्व में भारत का जो चिकित्सा दल यहाँ आया है और भारत की राष्ट्रीय महासभा ने चीनी जनता को उसके जापानी साम्राज्य वादियों से युद्ध करने के लिए अभिवादन और प्रोत्साहन के जो संदेश भेजे हैं उन्हे प्राप्त करके हमने बड़ी प्रसन्नता और सम्मान का अनुभव किया है।
हम आपको सूचित करना चाहते हैं कि भारतीय चिकित्सा दल ने यहाँ अपना काम शुरू कर दिया है। अर्थ रूट आर्मी के सभी सदस्यों ने उनका बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया है। दल के सदस्यों में हमारी कठिनाइयों में हाथ बटाने की जो भावना है,उससे उसके सम्पर्क में आने वाले लोग बड़े प्रभावित हुए हैं।
आपने चिकित्सा सम्बंधी और दूसरी वस्तुओं की जो सहायता दी है उसके लिए हम आपकी महान भारतीय जनता
और राष्ट्रीय महासभा को धन्यवाद देते हैं और उम्मीद करते हैं कि वे भविष्य में भी इस प्रकार की सहायता देते रहेंगे और हम मिल कर जापानी साम्राज्यवादियों को निकाल बाहर करेंगे। अन्त में,किंतु कम महत्व के साथ नहीं,हम आपको अपना धन्यवाद,शुभकामनायें और हार्दिक अभिवादन भेजना चाहते हैं।
आपका-
माओत्से तुंग
4-
चेंग यिंग-फुन की ओर से
चीनी शाखा
इण्टरनेशनल पीस कैम्पेन
पो.बॉ.123,चुंग किंग,चीन
21 अगस्त 1940
प्रिय श्री नेहरू!
हमें हिंदुस्तान की जनता से बड़ी हमदर्दी है वहाँ जो कछ भी होता रहा है उसका हम यहाँ बड़ी दिलचस्पी के साथ अध्ययन करते रहे हैं। हिंदुस्तान और चीन के इतिहास में कभी एक दूसरे के सीमान्त पर कोई सशस्त्र संघर्ष नहीं हुआ। इतिहास इस बात का साक्षी है कि सदभावना पूर्ण यात्राओं के माध्यम से हमने एक दूसरे की संस्कृति से केवल लाभ ही उठाया है। हमारे बीच चिरस्थायी मित्रता की यह एक दृढ़ नींव है। आपके श्रेष्ठ प्रयत्नों के लिये समस्त सदभावनाओं सहित-
आपका-
चेंग यिंग फुन
कार्यवाहक सचिव
आज की भारतीय राजनीति में पत्र लेखन भी एक दाँव बन गया है ये पत्र कभी तो अखबारों में छपवाए जाते हैं और कभी “लीक” हो कर स्वतः छप जाते हैं। राजनीतिक पत्र की जगह पत्र राजनीति नें ले लिया है। इसी आलोक में पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखे गए या उनको लिखे गए पत्रों को एक बार फिर से पढ़ना आवश्यक और प्रासंगिक हो गया है।
नवम्बर 11, 2011

अंदाज़ है अलग

नज़रों की बयानगी का अंदाज़ है अलग
इन्हें पेश करने के अल्फा़ज़ हैं अलग
अजब सी ये भाषा हर कोई जानता
इसे कहने सुनने का,अहसास है अलग
हो गम या खुशी, का रास्ता
नम आँखों के होने का,अंदाज़ है अलग
नाराज़गी भी और प्यार का सबब
काले घेरों के घूमने की,अदा है अलग
हों वफ़ाओं की बातें या तकरार की
इन नज़रों ने रचा है,इतिहास ही अलग
ख़्वाहिशें,चाहतें या कि तमन्ना कोई
इन्हें पूरा करती, हर नज़र है अलग
जो ज़ुबाँ भी,न कर पाती है कभी
नज़र की बयानगी,वो ख़ास है अलग…
नवम्बर 9, 2011 

जीते हैं लोग

जीते हैं लोग पर जीते नहीं
हाँ चलता है जिस्म और मन भी कभी
खा़मोश दिल,खा़मोश रहता नहीं।
दिखावा छलावा व्यापार है घना
हाड़ मांस का एक इंसान है बना
हैं जज़बात कितने,ये किसने सुना।
सही-गलत चर्चा ज़ोरों से रही
नज़रिया बदलना मुश्किल तो नहीं
पर ये चाह भी,सदा औरों से रही।
दुखा दिल कितना,न कोई ख़बर
नज़र का फेर है,या मन का वहम
सोच अपनी-अपनी,हैं अपने मरम।
उलझे हर पल,न सुकूं हैं कहीं
जीते हैं लोग पर जीते नहीं…
नवम्बर 6, 2011

शायराना अंदाज़-4

“तुझसे प्यार तो नहीं,फिर ये दर्द क्यों है
है रोज़ की ख़बर,फिर फ़िक्र क्यों है
समझ नहीं आता सुनूं तुझे,या तेरी खा़मोशी को
तू कहता कुछ,खा़मोशी का सबब कुछ और क्यों है”
अक्टूबर 30, 2011

बचपन की याद

कितना खूबसूरत,अल्हड़ सा बचपन
कंचे की चट-चट में बीता वो दिन
जीत की खुशी कभी हार का गम
रंगबिरंगे कंचों में घूमता बचपन।
गिल्ली डंडे का है आज मैदान जमा
किसकी कितनी दूर,है यही शोर मचा
डंडे पे उछली गिल्ली कर रही है नाच
दूर कहीं गिरती,आ जाती कभी हाथ
भागते हैं कदम कितने बच्चों के साथ
गिल्ली डंडे में बीता है बचपन का राग।
कभी बित्ती से खेलते कभी मिट्टी का घर
पानी पे रेंगती वो बित्ती की तरंग
भर जाती थी बचपन में कितनी उमंग।
कुलेड़ों को भिगोकर तराजू हैं बनाए
तौल के लिये खील-खिलौने ले आए
सुबह-सुबह उठकर दिये बीनने की होड़
लगता था बचपन है,बस भाग दौड़
सारे खेलों में ऊपर रहा गिट्टी फोड़
सात-सात गिट्टियाँ क्या खूब हैं जमाई
याद कर उन्हें आँख क्यूं भर आई।
हाँ घर-घर भी खेला सब दोस्तों के साथ
एक ही घर में सब करते थे वास
हाथ के गुट्टों में उछला,वो मासूम बचपन
दिल चाहे फिर लौट आए वो मधुबन
तुझ सा न कोई और दूसरा जीवन
कितना खूबसूरत,अल्हड़ सा बचपन…
अक्टूबर 28, 2011 

दीपों का आगमन

आई रे देखो आई
रौशनी ये आई
जल गए हैं दीप इतने-2
प्रकृति भी मुस्काई।
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
रात के इस तम को देखो
चाँदनी ने भर दिया
जलती बाती कह रही है
प्रियतम है मेरा दिया।
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
सारे दुखों को जलाकर
चकरी है मुस्काई
जीवन जैसे ऊपर नीचे
लौ अनार की आई
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
खुशियों की आहट है फैली
धूप ने महकाई
लक्ष्मी पूजन विघ्न हर्ता
भोग में है मिठाई
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
रात कारी लगा के काजल
हर नज़र से बचाई
सुबह की बेला खुशबू फैली
कितनी पावन आई
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई
जल गए हैं दीप इतने-2
प्रकृति भी मुस्काई।
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,
सादर-सस्नेह
इंदु
अक्टूबर 25, 2011 

धन+ते+रस=धनतेरस

धन से ही तो रस हैं सारे
धन ही सुख-दुख के सहारे
धन ही मंदिर,धन ही पूजा
न ऐसा कोई पर्व दूजा
धन ने किये हैं रौशन बाजार
बिन धन यहाँ न कोई मनुहार
सब चाहें चखना इस रस का स्वाद
बिन धन जीवन है बकवास
धन ही पहचान,यही अभिमान
सिवा इस रस के न कोई गुणगान
गज़ब है चाह न दिल कभी भरता
पीने को ये रस हर कोई मचलता
उमर बीत जाए न होगा कभी बस!
जितना मिले ले लें धन ते रस…
अक्टूबर 23, 2011

शायराना अंदाज़-3

“हम ही हम हैं तुम्ही तुम हो
वही दुनिया वही गम हैं
हमें क्या फ़िक्र जमाने की
हम ही तुम हो तुम्ही हम हैं”
“इश्क करने की वजह न पूछो कोई हमसे
बिना किसी वजह इश्क करते हैं हम
नफ़ा नुकसान का ये सौदा नहीं
फ़ेर है नज़र का,ऐतबार करते हैं हम”
अक्टूबर 19, 2011

लिखते हैं हम

न चाह है कोई न ही कोई अपेक्षा
खुशी के लिये बस लिखते हैं हम
न उन्हें है खबर न उनसे गिला
मिलता क्या सुकूं,जो लिखते हैं हम
घुमड़ता सा मन है,ये चंचल पवन
मंद पुरवाई में बैठ फिर सोचते हैं हम
फैला है विस्तार सा जीवन यहाँ
बस समेट लाने को पिरोते हैं हम
जब भाव खोजते हैं,तब शब्द बोलते हैं
शब्दों के रंगों को भरते हैं हम
लिखने की चाह न छूटे कभी
मन झंझोड़ने को अपना,लिखते हैं हम…

अक्टूबर 17, 2011

तुम्ही हो मेरा जीवन

तुम्ही हो मेरा जीवन
तु्म्हारे लिए तन-मन
करे इंतज़ार सदा तेरा प्यार
लाए खुशियाँ ढेर मेरे मन में
जाऊँ वार-वार करूं तुझसे प्यार
है ऐतबार तुझमें
करके श्रंगार मन में है प्यार
सब वार दूं मैं तुझपे
कुमुकुम तरंग,मेंहदीं का रंग
फैली है सुगंध मन में
पूजूं चाँद संग तुझे मैं अखण्ड
तेरी साँसों में हर सिंगार
लूं लाख जन्म चाहूँ तेरा संग
न और कुछ जीवन मे
तुम्ही हो मेरा जीवन
तु्म्हारे लिए तन-मन…

करवा चौथ की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ…
अक्टूबर 15, 2011 

कभी सोचा न था

जाना तु्म्हारा यूँ चुभेगा हमें
कभी सोचा न था
तुम यूँ चले जाओगे,न रोकेगा कोई
कभी सोचा न था
बरसों का प्यार भी था धोखा तुम्हे
इस सच से अंजान तुम?
कभी सोचा न था
सर्वस्व सौंपा था तुमने जिसे
वो सच में छीन लेगा
कभी सोचा न था
प्रेम की खातिर था जीवन तुम्हारा
वही छीन लेगा मधुबन भी तुम्हारा
कभी सोचा न था
हाँ टूटे हो तुम और टूटे हैं हम
बेबसी का ये नज़ारा
कभी सोचा न था
नई राह में इक नई चाह में
पड़ेगा जीना दुबारा
कभी सोचा न था
हों खुशियाँ ही खुशियाँ
जले दीपक की लौ
दुआ है अब,कभी फिर न हो
ऐसा कुछ
जो तुमने कभी सोचा न था…

अक्टूबर 14, 2011

कुछ ऐसे हैं दर्द

ह्रदय का क्रन्दन
न चुप हो रहा
व्यथित है मन
अश्रु पी रहा
ज़ख्मों की कोई
न सीमा रही
नासूर बन,जीवन
जल ही रहा
साँसे लगती हैं जैसे
मृत्यु की तपन
फिर भी ये जीवन
न घुल रहा
लब छुपाने की कोशिश
न कर पा रहे
रूंधता हुआ गला,
भर्रा सा रहा
भीड़ में भी नज़रें न
छुप पा रहीं
तन्हाइयों में भी
शून्य बना ही रहा
न कहीं है सुकूं न
कहीं है फ़िज़ा
जागी रातें हैं इतनी
मन थका सा रहा
पहन मुखौटा हंसी का
हम निकले जिधर
कोशिश करी कि खिला दें
हर कली-हर डगर
फिर भी न मन को
सुकूं मिल सका
कुछ ऐसे हैं दर्द,
न कोई बयाँ कर सका…
अक्टूबर 13, 2011

बेमाने से रिश्ते

बेमाने से लगते हैं कभी सारे ही रिश्ते
जिन्हे अपनी जान,अपना हम समझते।
फ़िक्र है उन्हें ये गुमा सदा रहता
भेद खुलता जब दिल काँच सा बिखरता
ज़रूरत की खातिर ही बनते हैं रिश्ते
अपना कोई वजूद नहीं रखते ये रिश्ते
समाज की बेदी पर हर रोज नये सजते
सूख कर फिर शाख के पत्ते से गिरते
कब,कहाँ कुचले न कोई देख पाता
खु़द ही दफ़न होते और खु़द ही फिर रोते
नम आँखों से फिर किसी चाह को खोजते
सहारे को अपने हम रिश्ते हैं जोड़ते…
अक्टूबर 11, 2011

कभी-कभी

कुछ अजीब सा खालीपन
लगता है कभी-कभी
न कोई है अपना कहीं
दर्द होता है कभी-कभी
रिश्तों से कभी भरता नहीं ये अधूरापन
इन सबके बीच महसूस होता है कभी-कभी
क्या सोचते हैं,और क्यूं हैं भला
जी बताना भी नहीं चाहता है कभी-कभी
खुश हैं हम सम्पन्न भी,फिर क्यूं
गहरे दर्द कहीं उठता है कभी-कभी
बंद आँखों के भीतर हैं सपने छुपे
उन सपनों की नमी मे,सीलता है मन कभी-कभी
क्या चाहत,क्या हसरत इन सबके बीच
कुछ अजीब सा खालीपन लगता है कभी-कभी…

सितम्बर 29, 2011 

औरत का जीवन

औरत का जीवन भी
जीवन है क्या
हर दिन नया जन्म
नयी शुरुवात है
इक ही जीवन के हैं
कई-कई रूप
इन रूपों में डूबी
औरत है कहाँ?
कहते हैं लोग औरत को महान
क्या सच में कर पाते हैं,
उसका मान…
माँ,बहन,बेटी न जाने कितने नाम
इन सब के बीच में
औरत ही रही गुमनाम।
कोई एक रूप वो
चुने भला कैसे
सम्पूर्णता पे उसकी ये
प्रश्न चिन्ह कैसे!
हर रूप में जीकर ही
बनती वो महान
अपने मूल रूप की न
कोई पहचान ?
निर्बल भी वो है,सबल भी वो
ममता भरी है,मृदुल भी वो
फिर भी है अपने आप से अंजान
रिश्तों में ही समाई है उसकी जान
कहते हैं लोग,औरत है महान..
सितम्बर 27, 2011

जीवन है बना उनके लिए कुरूप

हर रोज़ ही दिखते हैं
जीवन के रूप
हर रोज़ ही लगते हैं
वो कितने कुरूप
हम सोते हैं बंद कमरो में जब
बाहर बिखरे होते हैं,
जाने कितने ही सच।
न ठण्ड की सिकुड़न,न गरमी की ताप
बारिश भी उन्हें,लगती नहीं अभिशाप।
जिंदा हैं वो,ये जानते हैं हम
उन्हे नहीं अहसास! है यही गम।
गंदे हैं वो,हाँ चोर हैं वो
भिखारी ही नहीं,नशाखोर हैं वो।
न जाने हमने कितने,हैं पाले भरम
नहीं देख पाते कभी उनका मरम।
रहते हैं बंद गाड़ी,बंद कमरो में हम
बंद है आत्मा और नज़र भी बंद।
हैं निर्वस्त्र मन से,पर देखते उन्हें
वो सूखा बदन,वो देह ताप धूप
जीवन ने दिया है उन्हे ये रूप।
वो क्या हैं ये तो जाना नहीं मगर
यूँ ही कट जाएगा उनका सफ़र
न चाहत है कोई न कोई है भूख
जीवन है बना उनके लिए कुरूप…
सितम्बर 25, 2011

शायराना अदांज़-1

आसां न होगा राहे इश्क पे चलना
पर हो गया जब,फिर क्या गिला करना,
रोके कब रुका है राहगीरों के इश्क
गज़ब का अहसास है किसी से प्यार करना।

सितम्बर 24, 2011

चलते जाते हैं हम

कलम दर कलम
शब्द बे शब्द
भाव ही भाव
चलते जाते हैं हम।
कभी कुछ हँसी
कभी गम से भरे
समंदर में कहीं
बहते जाते हैं हम।
जब जिस भाव ने
धार रूप धरा
पूरे आवेग ने वही
वेश भरा
बहाव इतना तेज़
साथ दूर कहीं
बहते जाते हैं हम।
ठहराव आया,जब
मन भी रुका
उस शांत से वन में
गहन चले जाते हैं हम।
कहना है क्या,कहते हैं कुछ
कभी-कभी खुद को ही
न समझ पाते हैं हम।
है अपनी तलाश,या कि
मिलना है किससे
जाने किस राह पे
चलते जाते हैं हम।
कलम दर कलम
शब्द बे शब्द
भाव ही भाव
चलते जाते हैं हम…

सितम्बर 22, 2011

तेरी जुस्तजू

तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू
तुझे न ख़बर हम यूँ,हुए बेख़बर
तेरी चाह में कब यूँ,बीती सहर
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…
देखा कभी जब भी,निगाहों ने हमको
हुआ कुछ हमें था,न तुम्हे है ख़बर
धड़का है दिल फिर से,धड़की हैं साँसें
कैसे कहें तुमसे,हाल ये मगर
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…
आवाज़ तेरी है,हमें ही पुकारे
तुम्ही न समझ हो,न समझो इशारे
दिल चाहे कहना तुमसे,यही बार-बार
तुम हो हमारे हम ही,हैं तुम्हारा प्यार
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…
दिल की इन बातों को तो,समझो कभी
पास आओ ले लें,तुमको आगोश भर
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…

सितम्बर 19, 2011

सोचा आज कुछ लिखूँ

सोचा आज कुछ लिखूँ
सिर्फ तुम्हारे लिये
कलम चली ही नहीं
हँस पड़ी मुझ पर
भाव शून्य हो गए
दिल धड़का ही नहीं
मन कर रहा प्रयास बार-बार
फिर भी नहीं उठे
ह्रदय में उदगार
अब हम परेशां
लिखें भी तो क्या
न कुछ सूझने की,है क्या वजह!
ऐ मेरे अन्तर्मन कुछ तो बताओ
है कैसी ये पहेली?
बेबस हैं हम,लाचार भी
हुआ क्या है ये
कोई हल तो बताओ।
आई फिर आवाज़ कहीं बहुत दूर
अब तक जो लिखा,वो क्या था भला
हमारे सिवा न लिखा कुछ कहीं
शब्दों में लिपटे,भाव हैं वही
जो सोचे हैं तुमने हमारे लिये
सर्वस्व तुम्हारा हम ही तो है-
और हो तुम,सिर्फ हमारे लिये…

सितम्बर 16, 2011

हिंदी दिवस

आओ मनाएँ मिलकर आज का ये दिन
सुंदर भावों से सजाएँ आज का ये दिन
मात्र भाषा रूप में मिली है हमको
हिंदी हमारा गर्व है न छोड़ेंगे इसको
लाख भाषाएं आएँ,आना उनका काम
हमें तो है यही प्यारी,यही हमारा मान
सभी भाषाओं का,करते हम सम्मान
पर हिंदी है सर्वोपरि यही हमारी शान
क्या हुआ गर अंग्रेज़ी का है बहुत नाम
वो भी तो एक भाषा है,है उसे सलाम
किंतु हिंदी आज भी,है हमारी पहचान
दूसरों का मान ये सिखाती है हमें
हर रूप में तभी ये भाती है हमें
सहर्ष हम आज करते हैं तुम्हें नमन
हो तुम्ही हमारी भाषा,हो तुम्ही हमारा वतन…

हिंदी दिवस पर हर्षित मन है आज,फिर क्यूं भला सोचें कुछ और हम आज…
सितम्बर 13, 2011

रूमानी अहसास

रेशमी अहसास कुछ चाँदनी
सा आज
बहके हुए जज़बात,हैं
हमारे साथ
दूर तक फैली हुई तेरी
आरजू़ है बस
पलकों में बंद सिमटा वो
अनछुआ सा सच
न चाँद है साथ न तारों
की है छाँव
फिर भी है रौशन तेरे
होने की चाह
बहके से हम हैं,
बहके कदम
इक आगोश तेरा
गुम न जाएं हम
ये प्यार है कि बस
खुद को पाने की चाह
रेशमी अहसास… कुछ रेशमी अहसास…
सितम्बर 12, 2011

भावों के अक्षर

यूं तो भावों के अक्षर दिखते नहीं
फिर भी पढ़े जाते हैं भाव सदा से
हैं जिसके लिये जो भी दिल में उठे
कहे अनकहे व्यक्त हो ही जाते हैं
भावों को कहने की ज़रूरत तो नहीं
फिर भी हैं आज इतने निरक्षर
जो पढ़ नहीं पाते,इन भावों के अक्षर
उन्हें साक्षर बनाने के लिये
भावों को भी कहना पड़ता है।
भावों को बयाँ करना मुश्किल तो नहीं
फिर भी हम यही कर नहीं पाते
उससे भी आसां है उनको समझना
अफ़सोस! उन्हें हम समझ नहीं पाते
भावों के रूप हैं इतने सारे
नित नये विद्यार्थी,खूब नज़ारे
फिर भी रह जाते हैं भाव अधूरे
है इनकी ये किस्मत,ये भाव नहीं पाते
उठते हैं रोज ही,कहते भी रोज
मैं हूं एक भाव जो प्यार से भरा
हर रोज ही जीता हर रोज ही मरा…

सितम्बर 8, 2011

दीवारें भी बोलती हैं

बंद कमरे में खिड़की के पास
सींखचों से झांकती नज़र
देखती है बाहर
दिखता है कुछ साफ तो कुछ धुंधला सा
खिड़की पर लगी लोहे की छड़ियां,
रुकावट बन रही हैं
पुनः नज़र वापस कमरे में
वही बंद कमरा,वही खामोश दीवारें!
चारों तरफ दौड़ती है नज़र
चाहती है कुछ पूछना
कुछ कहना
पर कमरे में कोई नहीं
तब दीवारें ही तोड़ती हैं-अपना मूकपन
कहती हैं,एकांत का ये क्षण
कर लो अपना मन्थन
निष्पक्ष भाव से
फिर जो प्रश्न उठें तुम्हारे मन में
परिप्रेक्ष्य में उनके-
पूछना तुम हमसे
मिलेगा जवाब इसी खा़मोशी में तुम्हे
क्योंकि दीवारें
खा़मोश नहीं होती,मौन रहती हैं
और-प्रतिक्षण मौन से भी कुछ संदेश
संचरित होते हैं…

अगस्त 31, 2011

तुम्हारी याद भी हमदम

तुम्हारी याद भी हमदम
हमें हर पल सताती है
तुम्हारी चाह भी हमदम
हमें हर पल रुलाती है
तुम्हारे प्यार की खुशबू
ये सांसें चल ही जाती हैं
तुम्हारी सांसों की गरमी
हमें पिघला ही जाती है
तुम्हारी धड़कन की आवाज़
रूह में समा ही जाती है
क्यूँ इतना याद आते हो
जब कि हो नहीं तुम दूर
फिर भी प्यार बन कर तुम
हमें हर पल लुभाते हो
तुम्हारे हम सदा से हैं
यही धुन गुनगुनाती है
हमारे दिल की धड़कन भी
तुम्हे पहचान जाती है
कभी खुद से पूछना हमदम
धड़कन नाम किसका बताती है…

अगस्त 30, 2011 

आज की सुबह

आज की सुबह कुछ खास तो नहीं
फिर भी था इंतजार सुबह होने का
न आए फिर कभी इतनी लम्बी रात
आओ छोड़ दें गहरी निद्रा का साथ
है सुबह नयी है दौर ये नया
नये हौसलों का फिर जन्म है हुआ
उम्मीदों को अपनी जगाना है अब
इक नया इतिहास बनाना है अब
है लंबा सफर न घबराना तुम
गुजरी हुई रात में फिर न जाना तुम
आज की सुबह साफ है बहुत
नये हौसलों का अहसास है बहुत
शायद तभी था इंतज़ार,सुबह का
इस रोशनी में जीना कुछ खास है
आज की सुबह इक नया आगाज़ है…

अगस्त 28, 2011

द्वापर या कलयुग

आज यूँ ही अचानक अपने स्कूल के दिनों की याद आ रही थी और तभी याद आई एक कहानी जो किस कक्षा में पढ़ी थी यह तो याद नहीं किंतु उस कहानी नें या यूँ कहें कि उस यथार्थ नें उस बचपन को भी झकझोर दिया था
हालांकि तब इतनी समझ कहाँ थी कि कहानी के मर्म तक पहुंच पाते। कहानी की मुख्य पात्र थीं पन्नाधाय। ऐसा हम इसलिये कह रहे हैं क्योंकि आज हमें सिर्फ वही कहानी की मुख्य किरदार नज़र आ रही हैं। पन्नाधाय जो कि राजघराने की एक मामूली सी नौकरानी थीं और उन्होंने राष्ट्र हित के लिये,राज्य के भविष्य के राजा के लिये अपने स्वयं के बेटे की हत्या करवा दी थी ताकि राष्ट्र बचा रहे और राष्ट्र मान से बढ़ कर कुछ नहीं… ऐसी कुर्बानी जिसे सुनकर,पढ़कर देश भक्ति की सारी परिभाषायें भी खामोश हो नत मस्तक हो जाती हैं मां का ऐसा त्याग देख कर। जो देश हितार्थ अपने ही पुत्र को … राष्ट्र नायक के लिये पुत्र से बड़ी कुर्बानी कोई हो नहीं सकती। किंतु आज पन्नाधाय का नाम चंद लोगों को ही याद होगा। अब हम बात करते हैं द्वापर युग के वसुदेव की जो अपने पुत्र की प्राण रक्षा के लिये यशोदा की बेटी को रात के अंधेरे में उठा लाये थे उस समय यह घोर अपराध करते हए उनके हाथ क्यों नहीं कांपे,क्या यह मानवता है! कि अपने पुत्र की रक्षा के लिये किसी और की पुत्री को हत्या कराने के लिये उठा लें। जब भविष्य वाणी हो ही चुकी थी कि यही पुत्र कंस का वध करके राष्ट्र नायक बनेगा फिर भला उसका कोई बाल बांकां कैसे कर सकता था कि वसुदेव नें मानवता को ही कुचल डाला। अपने पुत्र की रक्षा के लिये द्वापर का ये आदर्श है जबकि कलयुग का उदाहरण है कि पन्नाधाय ने राष्ट्र के लिये अपने पुत्र को कुर्बान कर दिया।
द्वापर में वसुदेव जैसे पिता हैं और कलयुग में पन्नाधाय जैसी मां। वसुदेव राज घराने के थे अतः उनका अक्षम्य अपराध किसी ने नहीं देखा और पन्ना क्योंकि एक नौकरानी थी अतः उनकी अतुल्य कुर्बानी भी नज़र अंदाज ही रह गई…

अगस्त 25, 2011

जन्म दिन कैसे मनाया जाए

बहुत ही साधारण सा सवाल है किंतु जवाब अनेकानेक हैं। बच्चों का जन्म दिन तो प्रायः सभी एक ही तरह से मनाते हैं। पार्टी करी,केक काटा,गिफ्ट मिले,रिटर्न गिफ्ट दिये और हाँ सबसे बड़ी बात कि आज बच्चे का जन्म दिन है तो कोई उसे डांटेगा नहीं और इस तरह से मना लिया जन्म दिन…
अब बात हम अपनी करते हैं शायद आप सभी को ये महसूस हुआ हो कभी कि आज आप का जन्म दिन है
और सुबह से ही प्रेम पगे,शुभकामनाओं भरे फोन आपको आ रहे हैं और उनके साथ ही ये सवाल भी कि आज का क्या प्रोग्राम है? कुछ सुझाव भी मिलते हैं कि अरे भई आज तो घूमों फिरो,शॉपिग करो,पिक्चर जाओ आदि अनेकानेक सुझाव!और आप जिसका कि जन्म दिन है उसे ही समझ नहीं आ रहा कि आखिर किया क्या जाये।
सभी व्यस्त हैं और आपको घूमने-फिरने के लिये कह रहे हैं परन्तु कोई उनसे पूछे कि किसके साथ…
अंततः होता यही है कि कुछ अलग करने की चाह में आप अपना सबसे खास दिन एक आम दिन से भी ज़्यादा आम बना देते हैं। सभी करीबी इतने व्यस्त हैं कि आपको सिवाय सुझावों के कुछ पल भी देना उनके बस में नहीं। हाँ फेस बुक पर आपकी वॉल ज़रूर भरी मिलेगी वो भी बंडल के बंडल शुभकामनायें…
फेस बुक का सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि आप किसी का जन्म दिन भूलेंगे नहीं चाहे वो आपका मित्र हो या नहीं बस आपके फेस बुक पर होना चाहिये। कभी-कभी जन्म दिन आने से पहले यह सोचना पड़ता है कि लोगों के सुझावों का अनुसरण कैसे किया जायेगा क्योंकि आखिर आपका जन्म दिन है जिस दिन सिवाय सुझावों के आप तन्हां ही होंगे और बाकी सभी लोग व्यस्त…

गस्त 24, 2011
.

ज़िंदगी के रंग कई

गिरगिट की तरह रंग बदलती है ज़िंदगी
बचपन की हरकतों का बयाना है ज़िंदगी
जवानी की धड़कनों का गुनगुनाना है ज़िंदगी
बुढ़ापे की रुकी सांसों का आना है ज़िंदगी
मौत को चुपके से बुलाना है ज़िंदगी
गम ए दिल का समंदर है ज़िंदगी
तिल-तिल कर हर रोज मिटाना है ज़िंदगी
हजार आँसुओं का आना है ज़िंदगी
हर नाम पर रहती तू कु्र्बान ए ज़िंदगी
ऐ जिंदगी तेरे ग़म से परेशान ए जिंदगी
तुझे समझ पाना है मुश्किल ए ज़िंदगी
हँसा कर रुलाना ही आदत है ज़िंदगी
एक खुशी देकर बहलाना है ज़िंदगी
हर रूप में एक नयी बसती है ज़िंदगी
नयी धड़कनों की आवाज़ है ज़िंदगी
हर सुबह एक नयी शुरुआत है ज़िंदगी
ऐ ज़िंदगी तू है बड़ी अजीब ज़िंदगी
तू ही बता क्या यही तेरा नाम ज़िंदगी…

अगस्त 23, 2011 

लोकपाल बिलः मांगें उचित तरीका गलत

देश के मौजूदा हालात से सभी वाकिफ़ हैं क्योंकि शहर ही नहीं गाँव तक में अन्ना की जलाई मशाल खूब जल रही है मीडिया ने सभी को जागृत कर दिया है। अन्ना की भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में हम सभी शामिल हैं किंतु क्या हमें ये पताहै कि जन लोक बिल है क्या? शायद काफी लोग जानते भी नहीं होंगें किंतु जैसे ही बात भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने की आई हम सभी साथ हो लिये अन्ना के और सरकार को ही अपना सबसे बडा दुश्मन मान बैठे,सरकार की ही खिलाफत करने लगे हाँ सरकार ने एक गलती करी है अन्ना को गिरफ्तार करके जो कि कानूनी रूप से गलत है क्योंकि हमारे देश में किसी भी नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी सविंधान प्रदत्त मूल अधिकार है और अन्ना यही करने जा रहे थे -
आजादी केवल यही नहीं
अपनी सरकार बनाना है
आजादी है उसके खिलाफ
अपनी आवाज़ उठाना भी…

सरकार ने इस मूल अधिकार का अपहरण किया अन्ना को गिरफ्तार करके। हमारे देश मे कोई भी व्यक्ति अपना विरोध प्रकट कर सकता है बिना हिंसा किये हुए बशर्ते वो विरोध समाज के हितार्थ हो और अन्ना यही करने जा रहे थे जब सरकार ने उन्हे गिरफ्तार किया अतः सरकार ने कानून का उल्लंघन किया जिसकी जवाब देही सरकार को इस जन आंदोलन के रूप में मिल रही है।
अब हम बात करते हैं जन लोकपाल बिल की सबसे पहले हमें ये जान लेना चाहिये कि जन लोकपाल बिल के पास होने या न होने में कम से हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी का कोई हाथ नहीं है जबकि हम उन्हीं पर दोषारोपड़ किये जा रहे हैं। देश में कोई भी कानून बनाने का हक किसी भी नागरिक या प्रधानमंत्री को नहीं है बल्कि जो भी मुद्दा हो उस पर हमें पहले लोक सभा व राज्य सभा दोनों ही जगह अपना प्रतिनिधि रखना होता है जो आपके सुझाव को सभी के समक्ष प्रस्तुत करता है उसके पश्चात यदि उस प्र्ताव पर लोक सभा व राज्य सभा दोनों से ही 2/3 का बहुमत हासिल होता है तब वो प्रस्ताव देश के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है ओर यदि राष्ट्रपति उस पर सहमति देकर अपने साइन कर देते हैं तो वह सविंधान में संशोधन कर के किसी कानून के रूप में लागू हो सकता है यदि राष्ट्रपति उस पर साइन नहीं करते तो वह कानून नहीं बन पाता है और पुनः सारी प्रक्रिया होती है किंतु यदि दूसरी बार भी वह प्रस्ताव लोक सभा व राज्य सभा से समर्थन पा जाता है तब राष्ट्रपति विवश होता है उसे स्वीकार करने के लिये,राष्ट्रपति को उसकी सहमति देनी ही पड़ती है। यह एक सही तरीका है किसी कानून को लागू करवाने के लिये जो कि अन्ना नहीं कर रहे,संविधान का सम्मान सर्वोपरि है।

आज पूरा देश व देश के जाने माने नेता भी उनके साथ है तो यह तो स्वीकार नहीं होगा कि संसद में उनका कोई प्रतिनिधि नहीं है या इन महा-महीषियों को सविंधान के नियमों का इतना भी ज्ञान नहीं है जो कि बारहवीं कक्षा में ही नागरिक शास्त्र विषय मे क्षात्रों को पढ़ाया जाता है। अन्ना के पास सविंधान विशेषज्ञों की एक टीम है अच्छा होता कि वो जनता से यह अपील करते कि प्रत्येक व्यक्ति अपने संसद सदस्य से आग्रह करे कि वे खुल कर अन्ना का समर्थन करें तो निश्चित रूप से इस अपील से आंदोलन को बल मिलेगा और जन लोकपाल बिल जल्द ही पास होगा ऐसा हमारा विश्वास है।
तमाम नामी-गिरामी हस्तियों ने भविष्य में होने वाले चुनावों में अपनी सीट पक्की करने हेतु अन्ना अनशन में अपनी हाजिरी लगानी शुरू कर दी है परन्तु कोई भी खुलकर यह नहीं कह रहा कि अन्ना द्वारा प्रस्तुत इस मसौदे पर हम अन्ना के साथ हैं।
कल तक हम भी यही सोच रहे थे कि इस दायरे मे प्रधानमंत्री व न्यायाधीशों को रखने पर आपत्ति है क्या? किंतु आज हमे इसका भी उत्तर समझ आ रहा है। प्रधानमंत्री तो देश के रक्षक हैं और जब वो हमारे ही सर्व मान्य सांसद के बहुमत से चुने जाते हैं फिर उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल उठाना क्या उचित होगा! दूसरी मुख्य बात फिर तो हर कोई जिसके भी मन की न हुई वो प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शिकायत पत्र दे देगा और जो भी कार्य वो कर रहे होंगे न सिर्फ रोक दिया जायेगा बल्कि जब तक उस पर कार्यवाही नहीं हो जाती वो दूसरे किसी कार्य को पूरा नहीं कर सकेंगे इस तरह तो देश में
प्रधानमंत्री पद सदा खाली ही बना रहेगा क्योंकि विरोधी पार्टियां,विरोधी लोग एक के बाद एक शिकायत पत्र देते ही रहेंगे और ये देश की प्रगति,प्रधानमंत्री पद की गरिमा उनके कार्यों सभी को ठप कर देगा,पतन की ओर ही ले जायेगा क्योंकि बजाय देश उन्नति के कार्यों के वो इसी में उलझे रह जायेंगे इसी तरह न्यायमूर्ति न्यायाधीशों के फैसलों की भी रोज ही अवमानना होगी क्योंकि जिसके भी पक्ष में निर्णय नहीं हुआ वही खड़ा हो जायेगा कि न्यायाधीश ने पैसे मांगे थे इस के खिलाफ सुनवाई की जाये। देश के गरिमामयी पद और इनके संचालक अपने मूल भूत कर्तव्यों को छोड़ इन्ही में उलझ कर रह जायेंगे…
अतः जन लोकपाल बिल को एक संवैधानिक रूप से पास कराने की जरूरत है और साथ ही देश की गरिमा एवं प्रगति के लिये कुछ अनावश्यक मांगो पर भी विचार किया जाना चाहिए। अन्ना की उचित मांगों पर संवैधानिक रूप से हम अन्ना का समर्थन करते हैं। कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

आग कोई फिर दहकने जा रही है
नौजवानी फिर बहकने जा रही है
हद हुई,दिल्ली!सुनो ललकार अन्ना की
नौजवानी फिर नये इतिहास रचने जा रही है।

अन्ना के लिये सोहन लाल द्विवेदी जी की दो पंक्तियां सादर-
“चल पड़े जिधर दो डग मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर”

अगस्त 21, 2011