कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Thursday 9 February 2012

तुमसा न कोई

न मिला कोई तुम सा,पहले कभी
धड़कता है दिल पर धड़कन रुकी
जज़बात हैं यूँ सारे लफ्ज़ों मैं कैद
मिलेंगें जब हम,थम जायेगी घड़ी
वो सोचना तुम्हे यूँ भाने लगा
है तारों की दिल मे,वीणा बजी
अंगार से लब यूँ ग़रम हो गए
आँखों की चिलमन है खुद पे गड़ी
न ही सुनना है कुछ,न ही कहना तुमसे
ख़ामोशी भी दास्ताँ सुनाने लगी
तुम्हे हो तो हो,न हमें ये ख़बर
क्यूँ दिल की हर धड़कन तुम्हारी लगी।

1 comment:

  1. न ही सुनना है कुछ,न ही कहना तुमसे
    ख़ामोशी भी दास्ताँ सुनाने लगी

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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