कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Saturday, 17 March, 2012

मौत या मुक्ति


सुना था वो चुपके से दबे पाँव आती है
पर बिन बताए साथ ले जाती है,पता न था।
सुना था शरीर जड़वत जिंदा लाश बन जाता है
आत्मा से शरीर को ये खबर न हो,पता न था।
सुना था सुंदर घना वृक्ष भी पल में सूख जाता है
पर इतनी तेजी से कि महसूस ही न हो,पता न था।
आँखों से नमी चली जाती-पथरा जाती हैं वो सुना था
पथराई पुतलियों में हजारों सवाल जिंदा हों,पता न था।
सब कह तो रहे हैं वो आई संग ले गई अपने़
वक्त से पहले ही ले लेगी वो जाँ,पता न था।

7 comments:

  1. आपने सही सुना हैं, दवे पांव ही आती हैं |.......

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  2. जब गम दोस्त बन जाता
    अपना ही कातिल बन जाता
    मौत का आना ,मुक्ती देता

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  3. यही सच्चाई है.

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  4. "पथराई पुतलियों में हजारों सवाल जिंदा हों,पता न था।" बेहद खूबसूरत. लेकिन इसका हमें पता था!

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  5. such kaha aapne hridayanbhooti kagaj par utar jati hai

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  6. यही जीवन का शास्वत सत्य है...

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  7. ज़िंदगी के सफर की मंज़िल यही तो है शायद एक सच

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