कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday 29 January 2012

अजब है जीवन

अजब है जीवन अजब है रूप
हर दिन नई सीख,नया ही स्वरूप
आज जो सोचा,वो था कुछ अलग
पर क्या था न कहने की चाह है अब।
हजारों सवालों का न कोई जवाब
हर जवाब में छुपा इक नया ही सवाल
बेचारियत पे इनकी है किसको रहम
खुद ही उठते गिरते लड़खड़ाते कदम
कभी चाहे उड़ना कभी बस मिटना
जीवन के रूपों की न बात कोई करना।
हैं पल में ये सुंदर तो पल में कुरूप
जीवन समझने की न चाह कभी रखना
हर दिन हर पल,हर साँस है नई
हर साँस में बदलता है जीवन का रूप।
है सभी का ये जीवन,फिर भी है क्यों अलग
हर शख़्स यहाँ रखता है,अनेकों स्वरूप।
नवम्बर 24, 2011

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