कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Tuesday, 31 January, 2012

दूर-पास का फ़र्क

दूर रहता जो सदा वही भाता
पास की निगाह कमज़ोर क्यों होती
दूर की हँसी की,दिल में गूँज उठती
पास का दर्द नज़र अंदाज़ हो जाता।
दूर के अल्फ़ाज़ भी मिश्री से घुलते,
पास की मासूमियत पे सदा शक आता।
रिश्ते तो रिश्ते हैं,होते सदा’रिश्ते’ही
फिर क्यूँ दूर-पास का फर्क नज़र आता।
जनवरी 18, 2012 

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