कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday, 29 January, 2012

दीपों का आगमन

आई रे देखो आई
रौशनी ये आई
जल गए हैं दीप इतने-2
प्रकृति भी मुस्काई।
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
रात के इस तम को देखो
चाँदनी ने भर दिया
जलती बाती कह रही है
प्रियतम है मेरा दिया।
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
सारे दुखों को जलाकर
चकरी है मुस्काई
जीवन जैसे ऊपर नीचे
लौ अनार की आई
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
खुशियों की आहट है फैली
धूप ने महकाई
लक्ष्मी पूजन विघ्न हर्ता
भोग में है मिठाई
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
रात कारी लगा के काजल
हर नज़र से बचाई
सुबह की बेला खुशबू फैली
कितनी पावन आई
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई
जल गए हैं दीप इतने-2
प्रकृति भी मुस्काई।
आई रे देखो आई
रौशनी ये आई…
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,
सादर-सस्नेह
इंदु
अक्टूबर 25, 2011 

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