कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Tuesday 3 April 2012

साँसों का लम्हा रुका सा रहा


काँधे पे सर कुछ झुका सा रहा
साँसों का लम्हा रुका सा रहा।
बंद पलकें रूह में कुछ समा सा रहा
कपकपाते लबों का फ़साना रहा।
खुशबू-ए-जिस्म की मदहोशियत न पूछो
साँसों में तेरी साँसों का पहरा सा रहा।
परछाइयां भी हसीन लगने लगीं
इश्क का कुछ ऐसा नशा सा रहा।
गहराइयाँ थीं इतनी-सागर भी कम
था लम्हा मगर,जीवन जिया सा रहा।

6 comments:

  1. परछाइयां भी हसीन लगने लगीं
    इश्क का कुछ ऐसा नशा सा रहा ..

    बहुत खूब ... इश्क का नशा ही ऐसा होता है ... हर शै से प्यार हो जाता है ... लाजवाब शेर है इस गज़ल का ...

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  2. गहराइयाँ थीं इतनी-सागर भी कम
    था लम्हा मगर,जीवन जिया सा रहा।

    ....बहुत खूब ! बहुत सुन्दर गज़ल..

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  3. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल दाद तो कुबूल करनी ही होगी ...

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  4. ravishanker mishra5 April 2012 at 6:36 PM

    Hriday se likhi hriday anubhuti sachmuch hriday ko anubhuti karane me sampurn saxam .
    badhaeiiiiiiiiiiiiiiiiiii

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  5. INDU JI YE GHAZAL BAHUT HI ACHHI AUR DIL-AZIZ HAI..
    KUCHH SHER WAZAN ME HAIN LEKIN BEHAR(METER) ME NHI HAIN.
    LEKIN KUCHH ASHAAR NE TO KAMAAL KAR DIYA JAISE-
    खुशबू-ए-जिस्म की मदहोशियत न पूछो
    साँसों में तेरी साँसों का पहरा सा रहा।
    परछाइयां भी हसीन लगने लगीं
    इश्क का कुछ ऐसा नशा सा रहा। BAHUT HI HASIN ASHAAR HAIN YE!!!!

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