कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday, 29 January, 2012

हर पल तुम्हे चाहा,

हर पल तुम्हे चाहा,
हर पल तुम्हें पाया
मेरी यादों में है बसता
तेरी यादों का साया
हर रात ख़्वाबों में
है अक्स तेरा ही पाया
हर पल तुम्हे चाहा,

हर पल तुम्हें पाया
किस कदर से दिल पर
है रूप तेरा छाया
आँखों को तो हमारी
न कोई और भाया
हर पल तुम्हे चाहा,

हर पल तुम्हें पाया
उठी जो चिलमन तेरी
है चाँद भी मुस्काया
गिरी जो पलकें तेरी
है दिल मेरा धड़काया
हर पल तुम्हे चाहा,

हर पल तुम्हें पाया
मेरी यादों में है…

अगस्त 20, 2011 

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