कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Tuesday 31 January 2012

सैन्टा तुम आना ज़रूर

सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
ठण्ड से कहना,कि आए थोड़ा हौले
कई बच्चे-बूढ़े हैं सड़कों पे फैले
रात की गर्म चादर,है न उनके करीब
भर लाना अपनी झोली में उनका नसीब।
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
सूरज से कहना न इतना सताये
ले आना चन्द किरणे तुम उनके   लिये
जो आँखों से कभी न,जीवन देख पाये
सजा देना उन आँखों में,मीठे सपनों का नूर
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
हैं कितने ही अन्जान,जीवन के सुख से
भर देना उन सबमें, जीने का जुनून
गर आसां नहीं है तो मुश्किल न कहना
भर लाना अपनी झोली में,हौसला भरपूर
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
दिसम्बर 21, 2011

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