कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday 29 January 2012

द्वापर या कलयुग

आज यूँ ही अचानक अपने स्कूल के दिनों की याद आ रही थी और तभी याद आई एक कहानी जो किस कक्षा में पढ़ी थी यह तो याद नहीं किंतु उस कहानी नें या यूँ कहें कि उस यथार्थ नें उस बचपन को भी झकझोर दिया था
हालांकि तब इतनी समझ कहाँ थी कि कहानी के मर्म तक पहुंच पाते। कहानी की मुख्य पात्र थीं पन्नाधाय। ऐसा हम इसलिये कह रहे हैं क्योंकि आज हमें सिर्फ वही कहानी की मुख्य किरदार नज़र आ रही हैं। पन्नाधाय जो कि राजघराने की एक मामूली सी नौकरानी थीं और उन्होंने राष्ट्र हित के लिये,राज्य के भविष्य के राजा के लिये अपने स्वयं के बेटे की हत्या करवा दी थी ताकि राष्ट्र बचा रहे और राष्ट्र मान से बढ़ कर कुछ नहीं… ऐसी कुर्बानी जिसे सुनकर,पढ़कर देश भक्ति की सारी परिभाषायें भी खामोश हो नत मस्तक हो जाती हैं मां का ऐसा त्याग देख कर। जो देश हितार्थ अपने ही पुत्र को … राष्ट्र नायक के लिये पुत्र से बड़ी कुर्बानी कोई हो नहीं सकती। किंतु आज पन्नाधाय का नाम चंद लोगों को ही याद होगा। अब हम बात करते हैं द्वापर युग के वसुदेव की जो अपने पुत्र की प्राण रक्षा के लिये यशोदा की बेटी को रात के अंधेरे में उठा लाये थे उस समय यह घोर अपराध करते हए उनके हाथ क्यों नहीं कांपे,क्या यह मानवता है! कि अपने पुत्र की रक्षा के लिये किसी और की पुत्री को हत्या कराने के लिये उठा लें। जब भविष्य वाणी हो ही चुकी थी कि यही पुत्र कंस का वध करके राष्ट्र नायक बनेगा फिर भला उसका कोई बाल बांकां कैसे कर सकता था कि वसुदेव नें मानवता को ही कुचल डाला। अपने पुत्र की रक्षा के लिये द्वापर का ये आदर्श है जबकि कलयुग का उदाहरण है कि पन्नाधाय ने राष्ट्र के लिये अपने पुत्र को कुर्बान कर दिया।
द्वापर में वसुदेव जैसे पिता हैं और कलयुग में पन्नाधाय जैसी मां। वसुदेव राज घराने के थे अतः उनका अक्षम्य अपराध किसी ने नहीं देखा और पन्ना क्योंकि एक नौकरानी थी अतः उनकी अतुल्य कुर्बानी भी नज़र अंदाज ही रह गई…

अगस्त 25, 2011

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