कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday 29 January 2012

तुम्हारी याद भी हमदम

तुम्हारी याद भी हमदम
हमें हर पल सताती है
तुम्हारी चाह भी हमदम
हमें हर पल रुलाती है
तुम्हारे प्यार की खुशबू
ये सांसें चल ही जाती हैं
तुम्हारी सांसों की गरमी
हमें पिघला ही जाती है
तुम्हारी धड़कन की आवाज़
रूह में समा ही जाती है
क्यूँ इतना याद आते हो
जब कि हो नहीं तुम दूर
फिर भी प्यार बन कर तुम
हमें हर पल लुभाते हो
तुम्हारे हम सदा से हैं
यही धुन गुनगुनाती है
हमारे दिल की धड़कन भी
तुम्हे पहचान जाती है
कभी खुद से पूछना हमदम
धड़कन नाम किसका बताती है…

अगस्त 30, 2011 

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