कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday, 29 January, 2012

कुछ ऐसे हैं दर्द

ह्रदय का क्रन्दन
न चुप हो रहा
व्यथित है मन
अश्रु पी रहा
ज़ख्मों की कोई
न सीमा रही
नासूर बन,जीवन
जल ही रहा
साँसे लगती हैं जैसे
मृत्यु की तपन
फिर भी ये जीवन
न घुल रहा
लब छुपाने की कोशिश
न कर पा रहे
रूंधता हुआ गला,
भर्रा सा रहा
भीड़ में भी नज़रें न
छुप पा रहीं
तन्हाइयों में भी
शून्य बना ही रहा
न कहीं है सुकूं न
कहीं है फ़िज़ा
जागी रातें हैं इतनी
मन थका सा रहा
पहन मुखौटा हंसी का
हम निकले जिधर
कोशिश करी कि खिला दें
हर कली-हर डगर
फिर भी न मन को
सुकूं मिल सका
कुछ ऐसे हैं दर्द,
न कोई बयाँ कर सका…
अक्टूबर 13, 2011

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