कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday 29 January 2012

सत्ता का अधिकारी कौन

खोखली नींव के बीच
मजबूत दीवारें खोज़ते हैं हम
जिनका इतिवृत्त मालूम नहीं.
बाहर से रंगी ये दीवारें
आकर्षित कर लेती हैं
और हम बरबस ही
इन्हें सौंप देते हैं-सर्वस्व
धीरे-धीरे दीवारों का रंग
उतरता है
खोखलापन नज़र आता है
और तब रह जाते हैं आपके पास
खाली हाथ।
बिना नींव की इन दीवारों को
कब तक
ढोते रहेंगे,
जिस दिन ढहेंगी ये दीवारे
खुद भी ढह जायेंगे आप
ये तो फिर भी
नज़र आएंगी लेकिन,
स्वयं को नहीं खोज पाएंगे आप…

जुलाई 27, 2011

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