कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday 29 January 2012

बचपन की याद

कितना खूबसूरत,अल्हड़ सा बचपन
कंचे की चट-चट में बीता वो दिन
जीत की खुशी कभी हार का गम
रंगबिरंगे कंचों में घूमता बचपन।
गिल्ली डंडे का है आज मैदान जमा
किसकी कितनी दूर,है यही शोर मचा
डंडे पे उछली गिल्ली कर रही है नाच
दूर कहीं गिरती,आ जाती कभी हाथ
भागते हैं कदम कितने बच्चों के साथ
गिल्ली डंडे में बीता है बचपन का राग।
कभी बित्ती से खेलते कभी मिट्टी का घर
पानी पे रेंगती वो बित्ती की तरंग
भर जाती थी बचपन में कितनी उमंग।
कुलेड़ों को भिगोकर तराजू हैं बनाए
तौल के लिये खील-खिलौने ले आए
सुबह-सुबह उठकर दिये बीनने की होड़
लगता था बचपन है,बस भाग दौड़
सारे खेलों में ऊपर रहा गिट्टी फोड़
सात-सात गिट्टियाँ क्या खूब हैं जमाई
याद कर उन्हें आँख क्यूं भर आई।
हाँ घर-घर भी खेला सब दोस्तों के साथ
एक ही घर में सब करते थे वास
हाथ के गुट्टों में उछला,वो मासूम बचपन
दिल चाहे फिर लौट आए वो मधुबन
तुझ सा न कोई और दूसरा जीवन
कितना खूबसूरत,अल्हड़ सा बचपन…
अक्टूबर 28, 2011 

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