कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday, 29 January, 2012

सन्नाटा

दिन रात गूँजती सड़क पर
आज ये सन्नाटा,
तुम्हें नहीं मालूम,अभी तो
गुज़रा है साया मौत का
एक छटपटाता हुआ जिस्म
किनारे पड़ा है,ये कौन है..
क्या इंसान है,या फिर
मन इसी उधेड़बुन में था
तभी आई आवाज़
कोई आओ मेरे पास
मैं हूँ एक इंसान,तुम्हारी तरह
आकर मुझे बचाओ..
उसका शरीर रक्त से सना था और
पूरा जिस्म
घावों से भरा।
एक क्षण मन ने कहा
इसकी मदद करो
इंसान हो,इंसानियत का
हक तो अदा करो।
दूसरे ही क्षण बदला मन,नहीं
पता नहीं है ये कौन
मरता है तो मरे
कल न सही तो आज ही..
तभी धिक्कारती है-अन्तरात्मा
सोच कल तेरे साथ भी
हो सकता है ऐसा
उस वक्त कोई आए तेरे जैसा
तू यूँ ही तोड़ देगा दम
तड़प कर
पड़ी रहेगी तेरी लाश भी
सड़क पर
न कोई नज़र डालेगा
उस पर
तब तू भी यूँ ही
चिल्लाएगा
लोग हँसेंगे और तू
रो भी न पाएगा…

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