कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Tuesday 31 January 2012

एक ख़्वाब जिसे मन नहीं समझ रहा

अलसाई हुई आँखों में
एक अक्स उभरता है
देखने पर ध्यान से
वो अर्श ठहरता है
फिर बोझिल सी आँखें
कुछ खुली कुछ मुँदी
स्मृति पटल पर कोई
ख़याल नहीं घूमता।
आख़िर कौन है यह,जिसे
मन नहीं समझ रहा
तमाम कोशिशों पर भी ये
नहीं पिघल रहा
तभी एक सिहरन सी और
आँख कुछ खुली
नज़र गई सीधे अर्श पर
चेहरा न था वहाँ कोई
वो अमावस की रात थी,
नहीं सौगात कोई।
दिसम्बर 19, 2011

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