कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Monday 22 October 2012

हाँ स्त्री हूँ मै…


पुरुषत्व को जोड़ती
गहन गुफाओं में पनाह देती
स्त्री हूँ मै ।
एक नई स्रष्टि रचती
पहाड़ों से नदिया बहाती
स्त्री हूँ मै ।
इमारतों को बदल घर में
प्रेम की छाँव देती
स्त्री हूँ मै ।
अतिथि देवो भव,संस्कारों
को पिरोती पीढ़ी दर पीढ़ी
स्त्री हूँ मै ।
पिरोती समाज की हर रीत को
चटकती,बिखरती माला सी
स्त्री हूँ मै ।
हाँथों में सजा कर पूजा की थाली
आँखों में गंगा,ह्रदय में दुर्गा
स्त्री हूँ मै ।
देखो ! न दिखूँ जहाँ मै
वहाँ गौर से
सुनो ! न सुनाई दे जो
आवाज़ मेरी उसे
जवालामुखी सी बेहद शांत
स्त्री हूँ मै ।
सदियों से समाज मुझे समझाए जाए
जबकि अब तलक न ये खुद समझ पाए
स्रष्टि कर्ता ही नहीं
सम्पूर्ण स्रष्टि हूँ मै
हाँ ! स्त्री हूँ मै ….

Tuesday 3 April 2012

साँसों का लम्हा रुका सा रहा


काँधे पे सर कुछ झुका सा रहा
साँसों का लम्हा रुका सा रहा।
बंद पलकें रूह में कुछ समा सा रहा
कपकपाते लबों का फ़साना रहा।
खुशबू-ए-जिस्म की मदहोशियत न पूछो
साँसों में तेरी साँसों का पहरा सा रहा।
परछाइयां भी हसीन लगने लगीं
इश्क का कुछ ऐसा नशा सा रहा।
गहराइयाँ थीं इतनी-सागर भी कम
था लम्हा मगर,जीवन जिया सा रहा।

Friday 30 March 2012

सुनो !

सुनो ! चुप रहना अब
और बस
खुद को सुनो
देखो अभी-अभी कुछ
कहा तुमने
हाँ-हाँ ,शायद
नाम था कोई पुकारा तुमने
ध्यान… से सुनो
नाम क्या है वो ??
है जीवन या म्रत्यु
बताओ तो सही
सुनो !!!गहरे डूबकर
वो नाम खोज लाओ
सुना था मैंने, वो नाम
उसकी पुकार तुम भी तो सुनो….
सुनो !!!!
बस एक वही है सत्य
है तुम्हारे अन्दर
खुद को सुनो बस अब……

हरा पत्ता

टूटा हुआ एक पत्ता आज राह में मिल गया,था तो बिल्कुल हरा और नया सा। उसकी उम्र अधिक न थी, शायद
इसी ऋतु में जन्मा था वो। बेहद नर्म बेहद मासूम। देखते ही रो पड़ा नवजात शिशु की भाँति और कहने लगा कि मुझे
भूख लगी है स्नेह की पर मैं तो गिर गया शाख से,अब कैसे जुड़ूँ वापस। मुझे नहीं पता कि मैं खुद गिरा हूँ या कि गिराया गया हूँ लेकिन शाख के बड़े पत्ते मुझसे कह रहे थे कि तू यहाँ नहीं रह सकता, यह शाख हमारी है हम तुझसे अधिक बलशाली हैं। बड़े हैं उम्र में,कद में-पद में भी। तू यहाँ आ तो गया शाख की मर्ज़ी थी पर हम तुझे यहाँ बसने नहीं देंगे,तुझे गिरा देंगें और फिर पता नही शायद मैं सोया था या स्वप्न में,पर जब आँख खुली तो मैंने खुद को ज़मीं पर धूल से लिपटा पाया। हाँ धूल नें मुझे डाँटा नहीं बल्कि गले से लगाया लेकिन मैं तो अपनी शाख को चाहता हूँ और शाख मुझे लेकिन एक बात और मेरी समझ में नहीं आ रही कि शाख ने मुझे गिरने क्यो दिया? क्य शाख उन बड़े पत्तो से कमज़ोर है या कि पत्ते अधिक बलशाली,बात तो एक ही हुई ना…तो फिर? कहीं ऐसा तो नहीं कि शाख को भी मुझसे प्यार नहीं वो भी बस चाहती है उन्ही पुराने पत्तों का साथ।
जीवन चलता रहता है सबका आदि और अन्त है फिर किसी के साथ यह पहले और किसी के साथ बाद में क्यों? हर पत्ते का हक है कि वो शाख पर जन्मे और बढ़े। हरा फिर भूरा फिर सूखा और अन्त में बेरंग सा शाख से अलग हो मुक्त हो जाए। किंतु उस कोमल से हरे पत्ते को तो अभी जीना था,अपना हर रंग। फिर क्यों सिर्फ हरा रंग ही उसकी किस्मत बन गया। अब उसे चाहे जितना सहेजें वो हरा न रह पाएगा,हाँ उसकी रंगत ज़रूर बदलेगी पर न बदलेगा कद-काठी। ख़ामोश हो गया आज वो हरा पत्ता…

Tuesday 27 March 2012

नसीब से आज दीदार-ए-यार हो गया


नसीब से आज दीदार-ए-यार हो गया
हर क़लमा खिला,खुश गवार हो गया।
रूह से रूह का ऐतबार आज हो गया
जिस्म प्यार का गवह-गार हो गया।
देखा निगाहों ने जी-भर के आज खुद को
निगाहों को यार की पनाहों से प्यार हो गया।
धड़कनें बढ़ने लगीं-साँस तेज़ चल पड़ी
हो गये यार के जब क़ुबूल-ए-इज़हार हो गया।
अब तो इश्क की मुश्क का आलम न पूछो
यार ही मेरा ख़ुदा,ख़ुदा ही प्यार हो गया।
मौला हर आयत पे है नाम तेरा ही खुदा
आ पढ़ ले अब खुद,आयत ही प्यार हो गया।

Tuesday 20 March 2012

ये हुआ क्या…


न आँधी है कोई,
न ही हवाएँ हैं तेज़
हल्की सी सरसराहट
साथ उड़ा ले गई।
न हुई बारिश कहीं
न बादल ही घिरे
नमी थी ज़रा सी
संग बहा ले गई।
न सर पे हाँथ था कोई
न बाँहो में जकड़ा कोई
फिर भी आत्मा कहीं
गहरे समा ही गई।
न तो शोरगुल था
न घिरी थी ख़ामोशी
तन्हाइयाँ थीं फैली मगर
रूह को हँसा ही गई।
न सोए थे गहरी नींद में
न कोशिश थी जगने की
फिर कैसी जगी आरज़ू
कलम चला ही गई।

Saturday 17 March 2012

मौत या मुक्ति


सुना था वो चुपके से दबे पाँव आती है
पर बिन बताए साथ ले जाती है,पता न था।
सुना था शरीर जड़वत जिंदा लाश बन जाता है
आत्मा से शरीर को ये खबर न हो,पता न था।
सुना था सुंदर घना वृक्ष भी पल में सूख जाता है
पर इतनी तेजी से कि महसूस ही न हो,पता न था।
आँखों से नमी चली जाती-पथरा जाती हैं वो सुना था
पथराई पुतलियों में हजारों सवाल जिंदा हों,पता न था।
सब कह तो रहे हैं वो आई संग ले गई अपने़
वक्त से पहले ही ले लेगी वो जाँ,पता न था।

Wednesday 14 March 2012

अपनी ही तलाश में…

जीवन हर पल नया होता है इसलिए इसे किसी भी एक रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। हर दिन के अलग-अलग अनुभव,कभी अच्छे तो कभी बुरे और कभी कुछ खास नहीं,सामान्य। यह तो सभी जानते हैं कि यही उतार-चढ़ाव जीवन का रूप हैं,यही जीवन है पर फिर भी सदा यही समझ नहीं आता कि कौन से रूप को जीवन कहा जाए और यदि ये रूप ही जीवन हैं तो फिर जीवन का अपना अस्तित्व कया है? क्या वो स्वयं अस्तित्वहीन है और अभी वो अपनी ही तलाश में है। अनेकानेक सवाल उपजते हैं मन मे जवाब की तलाश में। अनेकों रूप तो दिखते हैं पर जीवन नहीं कयोंकि इन रूपों की अपनी वजह है,अपना वजूद है अतः ये जीवन नहीं। इनका स्वतंत्र रूप ही इनकी पहचान है और ‘रूप’ में आप सुख-दुख,हास्य-क्रोध,अमीरी-गरीबी जैसी हजारों भावनायें महसूस कर सकते हैं,जिनके आधार पर जीवन के मायने तलाशने लगते हैं-किंतु ‘जीवन’ जिसकी स्वयं की कोई पहचान नहीं उसके मायने ?
‘हम खुश हैं तो जीवन अच्छा हम दुखी जीवन बुरा’यही सब मानते हैं लेकिन अच्छा या बुरा हमसे जुड़ा है जीवन से नहीं फिर इस जीवन के विषय में इतनी चर्चा क्यों,हर ज़ुबाँ पर इसी का नाम क्यों।
शायद! अस्तित्वहीन चीज़ें अपने अस्तित्व की पहचान के लिए अधिक शोर मचाती हैं ताकि कोई तो उन्हें उनकी पहचान एक नाम दिला सके,और जीवन इसमें सर्वोपरि है तभी वो हर रूप,हर बात,हर क्षण खुद को अपनी मौजूदगी बताता है और अपने होने की शिनाख़्त चाहता है। तरस आता है जीवन पर,इसकी तमाम कोशिशों पर जो भटक रही हैं अपनी ही तलाश में… 

Monday 5 March 2012

औरत की दुश्मन है औरत यहाँ

औरत की दुश्मन है औरत यहाँ
फिर भी औरत ही बेचारी यहाँ।
हर हादसे का मुजरिम
क्या आदमी ही है ?’हाँ’
इल्ज़ाम लगा औरत
बन गई बेगुनाह।
भ्रूण से जन्म तक वो चाहे यही
हो लड़का ही पैदा न लड़की कभी
लड़की जो जन्मी तो कर्ज से भरी
लड़का ले आएगा धन की पोटली
लड़की पराई न काम की किसी
लड़के से जीवन की नईया टिकी
ये सोच,सिर्फ आदमी की नहीं है यहाँ
औरत ही ज़्यादा है स्वार्थी यहाँ।
हैवानियत है मर्दों की चारों तरफ
क्या यही इक पहचान, उनके लिए
बेचारियत है औरतों की चारों तरफ
क्या यही सच्चाई है,उनके लिए ?
हैवानियत का ताज है आदमी के सर
इस पीड़ा को कैसे वो,पिये हर पल
अबला है औरत और मासूम भी
इस आड़ में ही औरत,बेफिक्र यहाँ
न खुद से है प्यार,न खुद की है चाह
है औरत ही दुश्मन,औरत की यहाँ।

Wednesday 29 February 2012

शाम का वक्त


शाम का वक्त झील का किनारा
स्याह सा पानी,उतरा है दिल में
रूमानियत से भरी हवाएँ चूमती
मद्ध सी किरणें,यूँ लहरों पे पड़ती
समा ही हसीं है न नज़र कहीं हटती।
तीरे पे बत्तखों का इठला के आना
खोल पंख अपने,अदा से झिटक जाना
उफ ये मदहोशियत अजब सा जादू है
देख कर नज़रें,बस!!महसूस करतीं।
इक छोटा सा टुकड़ा बहता खुद आया
पल भर रुका,था कहीं टकराया
फिर इक लहर वो चल पड़ा उधर
इसी में पूरा जीवन नज़र आया।
शाम का वक्त किनारा झील का
संग अपने सुखद अहसास ले आया…

Tuesday 21 February 2012

मन बस यूँ ही मुस्काता है

बचपन से ही चलती गाड़ी से
सड़कों को देखना भाता है हमें
लगता था कि सड़क भाग रही है
और हम पीछे छूट रहे
बड़ा अचरज होता था तब।
कभी दूर सड़क पर पानी का दिखना
मृग तृष्णा का अर्थ,तब पता ही न था
जीवन के सबसे बड़े अजूबे
तब यही तो लगते थे।
आज यूँ बड़े हो,सब समझ तो गए
पर वो नासमझी के अचरज
मन खुद को वहीं कहीं पाता है
हम नहीं,सड़क चल रही
पेड़-पौधे चल रहे,
सोच इन यादों को
मन बस यूँ ही मुस्काता है।

छोटी सी लहर

तालाब में उठी वो छोटी सी लहर
फैल जाती है जिस्म-ओ-जिगर पर
लेकिन,बहुत शांत!!!
देती है गहरी खोह,’अब’तलाशो खुद को।
समंदर की तरह न वो शोर मचाए
बरबस ही ध्यान,न कभी खीँच पाए
फिर भी जीवन से,पहचान करा जाए
वो छोटी सी लहर…
हर हाल में है शांत,न कोई कौतूहल
न इक नज़र मे,किसी को खींच पाए
दृढ़ निश्चय है जीवन,कोमलता से कह जाए
वो छोटी सी लहर…
हो कितना भी विशाल,गहरा समंदर
समेटे है लाखों,तूफान अपने अंदर
हर लहर है थपेड़ा,किसने ये जाना
जीवन है शांत,यूँ ही गुज़र जाना
फिर क्यूँ भला हम,न ये जान पाए
हर बात को कितने,आराम से समझाए
वो छोटी सी लहर…

Tuesday 14 February 2012

तीखा है प्यार

तीखा है प्यार,असर कितना मीठा
घुलती हुई गुड़ की ढली के जैसा
न सख़्त है बहुत न बेहद नरम
ज़रा सी ताप-पिघल जाता है प्यार।
जाने कहाँ से उपजता,अहसास है
बीज है न बेढ़,न कोई खाद है
फिर भी लहलहाती फसल है प्यार।
ग़म आँखें भी हैं,कभी खुशी नम
हर ज़ख़्म पे लगे चाहत का मरहम
तासीर वेदना की घटाता है प्यार।
तूफ़ाँ भी कम है,हलचल-ए-इश्क में
रूह से जिस्म तक बवंडर का रुख़
एक क्षण में बदल देता है प्यार।
तीखा है प्यार-असर कितना मीठा…

Sunday 12 February 2012

तुम्हारे लिए

न लिख पायेंगे कुछ,तुम्हारे लिए
क्योंकि तुम-लिखने नहीं देते!!
यूँ हाँथ पकड़ मेरा जाने
कहाँ ले जाते हो
धीरे से हथेली,आँख पर सजाकर
किसी और ही दुनिया की सैर कराते हो।
कभी कोई नग़मा कभी कोई शेर,कभी
प्यार से रूह छू जाते हो।
पलकों पे सजा कोई ख़्वाब सा लगे
दरम्याँ न कोई तुम पास आ जाते हो।
चल रही हैं साँस,फिर भी तुम उसे
आलिंगन में अपने बाँध जाते हो।
महकता है मन और बहकते कदम,
हर जनम के लिए अपना बना जाते हो
न लिख पायेंगे कुछ,तुम्हारे लिए
संग अपने सदा हमें ले जाते हो।

Thursday 9 February 2012

तुमसा न कोई

न मिला कोई तुम सा,पहले कभी
धड़कता है दिल पर धड़कन रुकी
जज़बात हैं यूँ सारे लफ्ज़ों मैं कैद
मिलेंगें जब हम,थम जायेगी घड़ी
वो सोचना तुम्हे यूँ भाने लगा
है तारों की दिल मे,वीणा बजी
अंगार से लब यूँ ग़रम हो गए
आँखों की चिलमन है खुद पे गड़ी
न ही सुनना है कुछ,न ही कहना तुमसे
ख़ामोशी भी दास्ताँ सुनाने लगी
तुम्हे हो तो हो,न हमें ये ख़बर
क्यूँ दिल की हर धड़कन तुम्हारी लगी।

Tuesday 7 February 2012

जब भी होते खुश बहुत तुम

जब भी होते खुश बहुत तुम
मिलता अजब सुकूं सा हमको
पर देख तुम्हें परेशाँ कभी
दिल का हर कोना दुखता है
बस एक यही तो  न चाहा था।
बरसों बीते ये साथ न छूटा
अरमा बिखरे विश्वास न टूटा
हाँ हिस्से के सुख तु्म्हे न मिले
जब भी सोचा ये न चाहा था।
है उलझा जीवन,हो उलझन में तुम
सिलवट सा जीवन सोचा न था
दर्द तुम्हारे,हैं छलनी करते
चुभ-चुभ कर सीने को सदा हमारे
दिल है रोता सोच-सोच कर
तुम नाखुश हो,चाहा न था।
इक मुस्कान तुम्हारी अपनी,
लगे नए जीवन की ओढ़नी
सिवाय तुम्हारी खुशियों के बस
और कभी कुछ चाहा न था
जब भी होते खुश,हो बहत तुम
मिलता एक सुकूं सा हमको
जीवन में बस,यही चाहा था।

Friday 3 February 2012

रात के जज़बात


सदा तुम्हारा इंतज़ार क्यूँ रहता
वज़ूद क्या नहीं, कोई मेरा
माना कि तुम हो उजली साफ
तो क्या? जीवन नहीं घनेरा
हर आशा को सदा,तुझसे ही
जोड़ा जाता,जबकि
निराश और थके आते हैं सब
सदा,मेरी बाँहों में समाते हैं सब।
समझती उन्हे और हौसला भी भरती
चूम पलकों को झट आगोश में लेती
फिर भी कहते हैं लोग,फ़िक्र न कर
कट जाएगी रात—
आएगी सुबह,ले नई सौगात।
नई सोच को बल,सदा मुझसे
ही मिलता….
न मुझे कोई देखता,न कोई सराहता
जबकि हर जिस्म में,
ऊर्जा भरती हूँ मैं
थपकी मीठी नींद की,उमंग भरती हूँ मैं
हूँ ख़ास तो बहुत, फिर भी…..
क्यूँ रहता सदा तेरा इंतज़ार।
(रात के सवाल हैं सुबह से कुछ ख़ास)

Wednesday 1 February 2012

शायराना अंदाज़-12

“आज बात करने का दिल ही नहीं
ख़ुदा के लिये,न मजबूर कीजिए
अभी टूटा है दिल,सम्भाल तो लूं
फिर चाहे जितने ही ज़ख्म दीजिए”

Tuesday 31 January 2012

गणतंत्र दिवस-तिरसठ वर्ष


पूरे हुए तिरसठ वर्ष आज
हमारी ज़िंदगी के
वो वर्ष,जिनमें साँसें ली हमने
स्वेच्छा से
हर चीज़ है पाई अपनी
इच्छा से।
इन वर्षों में,हम
जिये हैं स्वतंत्रता से
ये निधि है,जो रखनी है
सम्भाल कर
मिली है हमें अपने
दादा-पुरखों से।
उनके खून से सनी न जाने
कितनी गलियाँ
और आहों से भरी हजारों
मुरझाई कलियाँ,
आज नज़र आती हैं हमें।
इन वर्षों में बहुत कुछ
बदल सा गया है..
आज अपने ही पराये के
बागीचे में जा खड़े हैं
क्या यही हमारी नैतिकता के धागे हैं?
ज़रा सी चोट लगी और टूट गए..
इन धागों में लगी,हजारों गाठें
अलग-अलग कर देती हैं एक-एक को
यदि इन गाँठों को हम हटा सकें
थोड़ी भी मानवता ला सकें
जिससे-
आने वालों को इंसानियत सिखा सकें,
बता सकें उन्हे कि देश है क्या
और वतन क्या!
क़ैद का मतलब है क्या,और
आजादी की परिभाषा क्या
यदि,ये अनुभव हम करा सकें
इन नौनिहालों को,तभी
कह सकेंगे कि हाँ..
पूरे किये हमने तिरसठ वर्ष आज
हमारी ज़िंदगी के।
जनवरी 25, 2012 

शायराना अंदाज़-11

“ख़ता ये हुई,तुम्हे खुद सा समझ बैठे
जबकि,तुम तो…
‘तुम’ ही थे”
जनवरी 20, 2012

दूर-पास का फ़र्क

दूर रहता जो सदा वही भाता
पास की निगाह कमज़ोर क्यों होती
दूर की हँसी की,दिल में गूँज उठती
पास का दर्द नज़र अंदाज़ हो जाता।
दूर के अल्फ़ाज़ भी मिश्री से घुलते,
पास की मासूमियत पे सदा शक आता।
रिश्ते तो रिश्ते हैं,होते सदा’रिश्ते’ही
फिर क्यूँ दूर-पास का फर्क नज़र आता।
जनवरी 18, 2012 

शायर का पैगाम,शायरी के लिये

शायराना सा हो रहा आज दिल मेरा
डर लगता है कहीं,हो न जाए ख़ता
कल होगा मिलन फिर हमारा तुम्हारा
आशा है नयी,मिल जाएगा किनारा।
सोचता हूँ कौन से रंग में दिखोगी तुम
बेख़बर,मेरे रंग में रंगी हो तुम
पर फिर भी नीला रंग,सदा तुम पे भाता
वो बात है अलग,निगाह आँखों से न हटा पाता।
खनक तेरे लबों की,यूँ पास मेरे गूँजती
वो झुकी पलकों की डोर मुझे खीँचती
कट जाए ये रात,आ जाए सवेरा
जनवरी 15, 2012 

फासला उम्र का

फासला उम्र का दिख जाता है बस यूँ ही
विचारों के फासले की उम्र नहीं दिखती
फिर भी सदा उम्र से विचारों को आँका जाता,
क्या अधिक उम्र से ही,जीवन दिख पाता?
सच है कि अनुभव सब सिखा जाता
हम सीखे हैं कितना,ये कौन जान पाता।
सीखने की चाह ही सदा जीत पाती
सोच का है फेर बस,समझ यही आता
विचारों की नदिया यूँ बहने को होती
किसी को माँझीं,किसी को मँझधार नज़र आता।
फासला उम्र का सदा दिख जाता…
जनवरी 13, 2012

सर्द दोपहर में


सर्द दोपहर में,बालकनी का वो कोना
जहाँ सूरज अपना छोटा सा
घर बनाता है,अच्छा लगता है।
हर’पहर’के साथ
खिसकता हुआ वो घर,जीवन पथ पर
चलना सिखाता है।
हो कितनी ही ठण्ड,पर उसकी गर्म सेंक
सुकून देती है।
है जीवन भी ऐसा,कभी सर्द तो कभी गर्म
हर कोने की सर्दी को सेंक देना है,
हर गर्म घर को शीतल कर देना है।
वो सूरज की किरणों का छोटा सा घर
सब की बालकनी में,एक कोना सा है…
जनवरी 10, 2012

निश्छल प्रेम


रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती।
झट सन्देसा ले कोई आ ही जाता
कैसी हो बिटिया,बड़ा समय काटा।
काकी हैं बूढ़ी़, न चल फिर पातीं
फिर भी अपने हाँथों से पेड़े बनातीं
खाकर उन पेड़ों का अमृत सा स्वाद
नम आँखों से आती,फिर काकी की याद।
साँझ तक बिटिया,मिलने आना ज़रूर
काकी हैं बूढ़ी़ फिर मिलें न मिलें!
तुम्हारी पसंद की बनवाई है ‘रस खीर’
आ कलेजे से लगो,चाहे यही तकदीर।
देख ये निश्छल प्रेम का नाता,
खुद में हीन,काकी पे गर्व आता
हर एक गाँव में हैं कितनी ही काकी
जला रखी है जिन्होंने निश्छल प्रेम  की बाती।
रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती… 

जनवरी 7, 2012