कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Tuesday, 31 January, 2012

निश्छल प्रेम


रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती।
झट सन्देसा ले कोई आ ही जाता
कैसी हो बिटिया,बड़ा समय काटा।
काकी हैं बूढ़ी़, न चल फिर पातीं
फिर भी अपने हाँथों से पेड़े बनातीं
खाकर उन पेड़ों का अमृत सा स्वाद
नम आँखों से आती,फिर काकी की याद।
साँझ तक बिटिया,मिलने आना ज़रूर
काकी हैं बूढ़ी़ फिर मिलें न मिलें!
तुम्हारी पसंद की बनवाई है ‘रस खीर’
आ कलेजे से लगो,चाहे यही तकदीर।
देख ये निश्छल प्रेम का नाता,
खुद में हीन,काकी पे गर्व आता
हर एक गाँव में हैं कितनी ही काकी
जला रखी है जिन्होंने निश्छल प्रेम  की बाती।
रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती… 

जनवरी 7, 2012  

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