कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

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Tuesday, 31 January 2012

शायराना अंदाज़-11

“ख़ता ये हुई,तुम्हे खुद सा समझ बैठे
जबकि,तुम तो…
‘तुम’ ही थे”
जनवरी 20, 2012

Sunday, 29 January 2012

शायराना अंदाज़-8

“कितना आसां है कहना,कि सब कह दिया
जबकि कहना था जो,कह न सके
कितना आसां है कहना,हमने समझ लिया
जबकि समझने को कुछ था ही नहीं।”
दिसम्बर 10, 2011

कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता

कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता
क्या है जीवन में किससे नाता
कुछ लोग हैं जो आपको,चाहें उम्र भर
लुटा दें सारा प्यार बिन माँगे आप पर
फ़िर भी हो आपको तलाश किसी की
जिसे आप चाहें,न मिल पाए उम्र भर
ग़र खुश हो तुम तो हम भी हैं खुश बहुत
कहते हुए ये,गला क्यूँ भर आता
अजब है दर्द जो समझ नहीं आता
पर इसका अहसास हरपल सताता
कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता…

अगस्त 17, 2011