कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

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Tuesday, 31 January 2012

सर्द दोपहर में


सर्द दोपहर में,बालकनी का वो कोना
जहाँ सूरज अपना छोटा सा
घर बनाता है,अच्छा लगता है।
हर’पहर’के साथ
खिसकता हुआ वो घर,जीवन पथ पर
चलना सिखाता है।
हो कितनी ही ठण्ड,पर उसकी गर्म सेंक
सुकून देती है।
है जीवन भी ऐसा,कभी सर्द तो कभी गर्म
हर कोने की सर्दी को सेंक देना है,
हर गर्म घर को शीतल कर देना है।
वो सूरज की किरणों का छोटा सा घर
सब की बालकनी में,एक कोना सा है…
जनवरी 10, 2012

घना कोहरा

जब भी दिखता है घना कोहरा
यूँ लगता है जीवन का रूप दिख गया
घना है बहुत, पर साफ भी बहुत
न छुपने छुपाने को कुछ रह गया।
दूर से लगे, न कुछ दिख रहा
गर घुसते चलें तो वो छँट भी रहा
कभी लगे घना कभी बहुत गहन
फिर भी है उसे,चीरती सूरज की किरण
होता अपने चरम पर, फिर भी ख़त्म होता
पार करना उसे यूँ न आसान होता
फिर भी धीरे- धीरे सब करते ही जाते
जीवन से कोहरे को हटाते ही जाते
है बड़ा ही ढीठ,आ जाता बार-बार
जीवन भी अडिग,सहता कोहरे का प्रहार
भर कर नया हौसला बढ़ते ही जाना है
हर एक के जीवन से,कोहरे को मिटाना है।
दिसम्बर 26, 2011 

Sunday, 29 January 2012

अजब है जीवन

अजब है जीवन अजब है रूप
हर दिन नई सीख,नया ही स्वरूप
आज जो सोचा,वो था कुछ अलग
पर क्या था न कहने की चाह है अब।
हजारों सवालों का न कोई जवाब
हर जवाब में छुपा इक नया ही सवाल
बेचारियत पे इनकी है किसको रहम
खुद ही उठते गिरते लड़खड़ाते कदम
कभी चाहे उड़ना कभी बस मिटना
जीवन के रूपों की न बात कोई करना।
हैं पल में ये सुंदर तो पल में कुरूप
जीवन समझने की न चाह कभी रखना
हर दिन हर पल,हर साँस है नई
हर साँस में बदलता है जीवन का रूप।
है सभी का ये जीवन,फिर भी है क्यों अलग
हर शख़्स यहाँ रखता है,अनेकों स्वरूप।
नवम्बर 24, 2011

जीवन की घुटन

भरी है जीवन में इतनी घुटन
रहा रिश्तों में उलझा,सदा ही मन
तलाशता रहा प्यार का दामन
न वफ़ा ही मिली,न कोई हमदम।
सूनी रातों में फिर टूटा तारा कहीं
लगा यूं मिल जाएगा किनारा कहीं
चाहूं संग उसका, अब हर घड़ी
पर उलझनें हैं फिर भी साथ में खड़ी।
सब रिश्तों से मिलती,है क्यूं चुभन
कभी खुल के जीने को तरसे ये मन
क्यूं भरी है जीवन में इतनी घुटन…
नवम्बर 22, 2011

तुम्ही हो मेरा जीवन

तुम्ही हो मेरा जीवन
तु्म्हारे लिए तन-मन
करे इंतज़ार सदा तेरा प्यार
लाए खुशियाँ ढेर मेरे मन में
जाऊँ वार-वार करूं तुझसे प्यार
है ऐतबार तुझमें
करके श्रंगार मन में है प्यार
सब वार दूं मैं तुझपे
कुमुकुम तरंग,मेंहदीं का रंग
फैली है सुगंध मन में
पूजूं चाँद संग तुझे मैं अखण्ड
तेरी साँसों में हर सिंगार
लूं लाख जन्म चाहूँ तेरा संग
न और कुछ जीवन मे
तुम्ही हो मेरा जीवन
तु्म्हारे लिए तन-मन…

करवा चौथ की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ…
अक्टूबर 15, 2011 

कुछ ऐसे हैं दर्द

ह्रदय का क्रन्दन
न चुप हो रहा
व्यथित है मन
अश्रु पी रहा
ज़ख्मों की कोई
न सीमा रही
नासूर बन,जीवन
जल ही रहा
साँसे लगती हैं जैसे
मृत्यु की तपन
फिर भी ये जीवन
न घुल रहा
लब छुपाने की कोशिश
न कर पा रहे
रूंधता हुआ गला,
भर्रा सा रहा
भीड़ में भी नज़रें न
छुप पा रहीं
तन्हाइयों में भी
शून्य बना ही रहा
न कहीं है सुकूं न
कहीं है फ़िज़ा
जागी रातें हैं इतनी
मन थका सा रहा
पहन मुखौटा हंसी का
हम निकले जिधर
कोशिश करी कि खिला दें
हर कली-हर डगर
फिर भी न मन को
सुकूं मिल सका
कुछ ऐसे हैं दर्द,
न कोई बयाँ कर सका…
अक्टूबर 13, 2011

औरत का जीवन

औरत का जीवन भी
जीवन है क्या
हर दिन नया जन्म
नयी शुरुवात है
इक ही जीवन के हैं
कई-कई रूप
इन रूपों में डूबी
औरत है कहाँ?
कहते हैं लोग औरत को महान
क्या सच में कर पाते हैं,
उसका मान…
माँ,बहन,बेटी न जाने कितने नाम
इन सब के बीच में
औरत ही रही गुमनाम।
कोई एक रूप वो
चुने भला कैसे
सम्पूर्णता पे उसकी ये
प्रश्न चिन्ह कैसे!
हर रूप में जीकर ही
बनती वो महान
अपने मूल रूप की न
कोई पहचान ?
निर्बल भी वो है,सबल भी वो
ममता भरी है,मृदुल भी वो
फिर भी है अपने आप से अंजान
रिश्तों में ही समाई है उसकी जान
कहते हैं लोग,औरत है महान..
सितम्बर 27, 2011

जीवन है बना उनके लिए कुरूप

हर रोज़ ही दिखते हैं
जीवन के रूप
हर रोज़ ही लगते हैं
वो कितने कुरूप
हम सोते हैं बंद कमरो में जब
बाहर बिखरे होते हैं,
जाने कितने ही सच।
न ठण्ड की सिकुड़न,न गरमी की ताप
बारिश भी उन्हें,लगती नहीं अभिशाप।
जिंदा हैं वो,ये जानते हैं हम
उन्हे नहीं अहसास! है यही गम।
गंदे हैं वो,हाँ चोर हैं वो
भिखारी ही नहीं,नशाखोर हैं वो।
न जाने हमने कितने,हैं पाले भरम
नहीं देख पाते कभी उनका मरम।
रहते हैं बंद गाड़ी,बंद कमरो में हम
बंद है आत्मा और नज़र भी बंद।
हैं निर्वस्त्र मन से,पर देखते उन्हें
वो सूखा बदन,वो देह ताप धूप
जीवन ने दिया है उन्हे ये रूप।
वो क्या हैं ये तो जाना नहीं मगर
यूँ ही कट जाएगा उनका सफ़र
न चाहत है कोई न कोई है भूख
जीवन है बना उनके लिए कुरूप…
सितम्बर 25, 2011

कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता

कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता
क्या है जीवन में किससे नाता
कुछ लोग हैं जो आपको,चाहें उम्र भर
लुटा दें सारा प्यार बिन माँगे आप पर
फ़िर भी हो आपको तलाश किसी की
जिसे आप चाहें,न मिल पाए उम्र भर
ग़र खुश हो तुम तो हम भी हैं खुश बहुत
कहते हुए ये,गला क्यूँ भर आता
अजब है दर्द जो समझ नहीं आता
पर इसका अहसास हरपल सताता
कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता…

अगस्त 17, 2011

जो जितना व्यस्त उतना सफल

सुख-दुख,आना-जाना सब जीवन के पहलू हैं हर कोई ये जानता भी है और समझता भी।सच भी यही है कि जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिए हर पल को आनंद से भर लेना चाहिए।कभी-कभी शायद सभी ने ऐसा महसूस किया ज़रूर होगा भले ही मात्र एक क्षण को जैसे खुशियाँ सारी पास हैं फिर भी कुछ तलाश है।कभी ऐसा भी लगता है कि आप चारों तरफ अपनों से उनके अपनत्व से घिरे हैं किंतु इतनी भीड़ के बावजूद भी कभी अकेलापन महसूस होता है।
जीवन में व्यस्तताएँ बहुत बढ़ गई हैं ऐसा लोग प्रायः कहते हैं किंतु क्या वास्तविकता यही है।थ्री-जी का जमाना है इधर सोचा उधर मिला,कार्य की तीव्रता इच्छाशक्ति समान हो गई है फिर व्यस्तता है कहाँ?परिवार के लिए समय नहीं,दोस्तों से भी संपर्क नहीं,ऑफिस के काम भी पैंडिग चल रहे है,फिर व्यस्त कहाँ हैं हम यही खबर नहीं।
शायद मन को व्यस्तता शब्द ने जकड़ लिया है बस।चारों तरफ एक भागमभाग मची हुई है कि कौन ज़्यादा व्यस्त है जितना ज़्यादा जिसने व्यस्त दिखा लिया स्वयं को उतना ही अधिक वो चर्चा में।जीवन में बड़ा कठिन
है बदलते समय से तालमेल बिठाना-बगैर किसी परेशानी के परेशान होने का ख़िताब पाना। जैसे पहले लोगों को उनकी योग्यतानुसार उपाधियों से नवाज़ा जाता था वैसे ही आज भी यह प्रथा जोर-शोर से फल-फूल रही है समय के साथ उपाधियों के नाम में परिवर्तन भर हो गया है मात्र, ये हमारी आज के युग की प्रसिद्ध उपाधियाँ हैं-बेचारा-बेचारी,हैरान-परेशान,व्यस्त,काम ही काम और न जाने क्या-क्या…
जीवन का आंनद लेना चाहिए शायद हमें यही सारे शब्द आनंदित कर देते हैं जब लोग कहते हैं हाँ-हाँ हम समझते हैं तुम्हें।चोट लगे बिना ही दवा-मरहम सब मिल रहा है,कितना आनंद आता है लोगों ने बेचारा कहा,परेशान कहा और व्यस्त भी कह दिया अब तो और भी बढ़िया-सोने पे सुहागा। कहावत भी कह डाली मन ही मन-हींग लगी न फिटकरी और रंग भी चोखा। दो पक्तिंया याद आ रही हैं बस-

हमेशा झूठ हम आपस में बोलते आए
न मेरे दिल में न तेरी जबाँ पे छाला है…

जुलाई 28, 2011

जीवन के हैं खेल अजब

जीवन के हैं खेल अजब
न कोई समझ पाया
किसने कितना विष है पिया
ये नशा किसे क्यों आया
कोई तो सुख में भी
सुखी नहीं
निज ढूढ़े नए बहाने
वो हैं क्यों इतने खुश
बस यही जाल फैलाया
काश जानते कि ईश्वर ने क्यों
बगिया में फूल खिलाया
जीवन है बगिया फूलों की
न कोई समझ ये पाया
रंगों की इस विविधता को
जो भी समझ है पाया
सही मायने में उसने ही
जीवन को अपनाया
जीवन के हैं खेल अजब
न कोई समझ पाया…