“ख़ता ये हुई,तुम्हे खुद सा समझ बैठे
जबकि,तुम तो…
‘तुम’ ही थे”
जनवरी 20, 2012
जबकि,तुम तो…
‘तुम’ ही थे”
जनवरी 20, 2012
जब जो ह्रदय ने जैसा महसूस किया हमारी कलम ने उसे पंक्ति बद्ध कर दिया। सारी कविताएँ बिना किसी प्रयास स्वतः ही लिख गई हैं,क्यों कि जब भी दिल को कुछ छूता है भाव उठते हैं हमारा बस हमारी कलम पर नहीं रहता। ये क्या है कैसा है ये तो नहीं पता पर हाँ जो भी है स्वाभाविक है,सिवाय भावनाओं के कुछ नहीं।