कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

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Tuesday, 31 January 2012

शायराना अंदाज़-11

“ख़ता ये हुई,तुम्हे खुद सा समझ बैठे
जबकि,तुम तो…
‘तुम’ ही थे”
जनवरी 20, 2012

शायर का पैगाम,शायरी के लिये

शायराना सा हो रहा आज दिल मेरा
डर लगता है कहीं,हो न जाए ख़ता
कल होगा मिलन फिर हमारा तुम्हारा
आशा है नयी,मिल जाएगा किनारा।
सोचता हूँ कौन से रंग में दिखोगी तुम
बेख़बर,मेरे रंग में रंगी हो तुम
पर फिर भी नीला रंग,सदा तुम पे भाता
वो बात है अलग,निगाह आँखों से न हटा पाता।
खनक तेरे लबों की,यूँ पास मेरे गूँजती
वो झुकी पलकों की डोर मुझे खीँचती
कट जाए ये रात,आ जाए सवेरा
जनवरी 15, 2012