कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Wednesday, 29 February 2012

शाम का वक्त


शाम का वक्त झील का किनारा
स्याह सा पानी,उतरा है दिल में
रूमानियत से भरी हवाएँ चूमती
मद्ध सी किरणें,यूँ लहरों पे पड़ती
समा ही हसीं है न नज़र कहीं हटती।
तीरे पे बत्तखों का इठला के आना
खोल पंख अपने,अदा से झिटक जाना
उफ ये मदहोशियत अजब सा जादू है
देख कर नज़रें,बस!!महसूस करतीं।
इक छोटा सा टुकड़ा बहता खुद आया
पल भर रुका,था कहीं टकराया
फिर इक लहर वो चल पड़ा उधर
इसी में पूरा जीवन नज़र आया।
शाम का वक्त किनारा झील का
संग अपने सुखद अहसास ले आया…

Tuesday, 21 February 2012

मन बस यूँ ही मुस्काता है

बचपन से ही चलती गाड़ी से
सड़कों को देखना भाता है हमें
लगता था कि सड़क भाग रही है
और हम पीछे छूट रहे
बड़ा अचरज होता था तब।
कभी दूर सड़क पर पानी का दिखना
मृग तृष्णा का अर्थ,तब पता ही न था
जीवन के सबसे बड़े अजूबे
तब यही तो लगते थे।
आज यूँ बड़े हो,सब समझ तो गए
पर वो नासमझी के अचरज
मन खुद को वहीं कहीं पाता है
हम नहीं,सड़क चल रही
पेड़-पौधे चल रहे,
सोच इन यादों को
मन बस यूँ ही मुस्काता है।

छोटी सी लहर

तालाब में उठी वो छोटी सी लहर
फैल जाती है जिस्म-ओ-जिगर पर
लेकिन,बहुत शांत!!!
देती है गहरी खोह,’अब’तलाशो खुद को।
समंदर की तरह न वो शोर मचाए
बरबस ही ध्यान,न कभी खीँच पाए
फिर भी जीवन से,पहचान करा जाए
वो छोटी सी लहर…
हर हाल में है शांत,न कोई कौतूहल
न इक नज़र मे,किसी को खींच पाए
दृढ़ निश्चय है जीवन,कोमलता से कह जाए
वो छोटी सी लहर…
हो कितना भी विशाल,गहरा समंदर
समेटे है लाखों,तूफान अपने अंदर
हर लहर है थपेड़ा,किसने ये जाना
जीवन है शांत,यूँ ही गुज़र जाना
फिर क्यूँ भला हम,न ये जान पाए
हर बात को कितने,आराम से समझाए
वो छोटी सी लहर…

Tuesday, 14 February 2012

तीखा है प्यार

तीखा है प्यार,असर कितना मीठा
घुलती हुई गुड़ की ढली के जैसा
न सख़्त है बहुत न बेहद नरम
ज़रा सी ताप-पिघल जाता है प्यार।
जाने कहाँ से उपजता,अहसास है
बीज है न बेढ़,न कोई खाद है
फिर भी लहलहाती फसल है प्यार।
ग़म आँखें भी हैं,कभी खुशी नम
हर ज़ख़्म पे लगे चाहत का मरहम
तासीर वेदना की घटाता है प्यार।
तूफ़ाँ भी कम है,हलचल-ए-इश्क में
रूह से जिस्म तक बवंडर का रुख़
एक क्षण में बदल देता है प्यार।
तीखा है प्यार-असर कितना मीठा…

Sunday, 12 February 2012

तुम्हारे लिए

न लिख पायेंगे कुछ,तुम्हारे लिए
क्योंकि तुम-लिखने नहीं देते!!
यूँ हाँथ पकड़ मेरा जाने
कहाँ ले जाते हो
धीरे से हथेली,आँख पर सजाकर
किसी और ही दुनिया की सैर कराते हो।
कभी कोई नग़मा कभी कोई शेर,कभी
प्यार से रूह छू जाते हो।
पलकों पे सजा कोई ख़्वाब सा लगे
दरम्याँ न कोई तुम पास आ जाते हो।
चल रही हैं साँस,फिर भी तुम उसे
आलिंगन में अपने बाँध जाते हो।
महकता है मन और बहकते कदम,
हर जनम के लिए अपना बना जाते हो
न लिख पायेंगे कुछ,तुम्हारे लिए
संग अपने सदा हमें ले जाते हो।

Thursday, 9 February 2012

तुमसा न कोई

न मिला कोई तुम सा,पहले कभी
धड़कता है दिल पर धड़कन रुकी
जज़बात हैं यूँ सारे लफ्ज़ों मैं कैद
मिलेंगें जब हम,थम जायेगी घड़ी
वो सोचना तुम्हे यूँ भाने लगा
है तारों की दिल मे,वीणा बजी
अंगार से लब यूँ ग़रम हो गए
आँखों की चिलमन है खुद पे गड़ी
न ही सुनना है कुछ,न ही कहना तुमसे
ख़ामोशी भी दास्ताँ सुनाने लगी
तुम्हे हो तो हो,न हमें ये ख़बर
क्यूँ दिल की हर धड़कन तुम्हारी लगी।

Tuesday, 7 February 2012

जब भी होते खुश बहुत तुम

जब भी होते खुश बहुत तुम
मिलता अजब सुकूं सा हमको
पर देख तुम्हें परेशाँ कभी
दिल का हर कोना दुखता है
बस एक यही तो  न चाहा था।
बरसों बीते ये साथ न छूटा
अरमा बिखरे विश्वास न टूटा
हाँ हिस्से के सुख तु्म्हे न मिले
जब भी सोचा ये न चाहा था।
है उलझा जीवन,हो उलझन में तुम
सिलवट सा जीवन सोचा न था
दर्द तुम्हारे,हैं छलनी करते
चुभ-चुभ कर सीने को सदा हमारे
दिल है रोता सोच-सोच कर
तुम नाखुश हो,चाहा न था।
इक मुस्कान तुम्हारी अपनी,
लगे नए जीवन की ओढ़नी
सिवाय तुम्हारी खुशियों के बस
और कभी कुछ चाहा न था
जब भी होते खुश,हो बहत तुम
मिलता एक सुकूं सा हमको
जीवन में बस,यही चाहा था।