कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Tuesday, 31 January 2012

शायराना अंदाज़-10

“इंतज़ार उनका,कुछ हुआ इस तरह
हो बेचैन रूह भी मचलने लगी,
हर लम्हे पे टिकी थी बेसब्र नज़र
हुआ हमें ,उन्हें दिललगी लगी।”
जनवरी 5, 2012 

स्वागत नव वर्ष का


नव वर्ष लेकर आ रहा
मन में नया सा हर्ष,
कैसे करें और क्या भला
छिड़ रहा यही संघर्ष।
दिल खुशी से झूमता,
स्वागत को ये आतुर
चहुँ ओर फैले नव किरण
चाहे यही दिवाकर।
सब का जीवन जगमगाए
नव ज्योति सा पावन
हो चाहतें भी सारी पूरी
न बचे कोई चुभन।
आओ मन में ठान लें अब
लें नया संकल्प,
सदभावना हो सबके लिए
न कोई और विकल्प।
नव वर्ष यूँ ही आएंगें
ले नित नये दिनमान
छोड़कर अभिमान हमें
रखना है सबका मान।
ह्रदय द्वार है खोलकर
करते हम स्वीकार
नव वर्ष आपके जीवन में
ले आए खुशियाँ अपार।
नये वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाओं एवं बीते वर्ष की मधु स्मृतियों के साथ आप सभी की,
इंदु     
दिसम्बर 30, 2011

घना कोहरा

जब भी दिखता है घना कोहरा
यूँ लगता है जीवन का रूप दिख गया
घना है बहुत, पर साफ भी बहुत
न छुपने छुपाने को कुछ रह गया।
दूर से लगे, न कुछ दिख रहा
गर घुसते चलें तो वो छँट भी रहा
कभी लगे घना कभी बहुत गहन
फिर भी है उसे,चीरती सूरज की किरण
होता अपने चरम पर, फिर भी ख़त्म होता
पार करना उसे यूँ न आसान होता
फिर भी धीरे- धीरे सब करते ही जाते
जीवन से कोहरे को हटाते ही जाते
है बड़ा ही ढीठ,आ जाता बार-बार
जीवन भी अडिग,सहता कोहरे का प्रहार
भर कर नया हौसला बढ़ते ही जाना है
हर एक के जीवन से,कोहरे को मिटाना है।
दिसम्बर 26, 2011 

सैन्टा तुम आना ज़रूर

सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
ठण्ड से कहना,कि आए थोड़ा हौले
कई बच्चे-बूढ़े हैं सड़कों पे फैले
रात की गर्म चादर,है न उनके करीब
भर लाना अपनी झोली में उनका नसीब।
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
सूरज से कहना न इतना सताये
ले आना चन्द किरणे तुम उनके   लिये
जो आँखों से कभी न,जीवन देख पाये
सजा देना उन आँखों में,मीठे सपनों का नूर
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
हैं कितने ही अन्जान,जीवन के सुख से
भर देना उन सबमें, जीने का जुनून
गर आसां नहीं है तो मुश्किल न कहना
भर लाना अपनी झोली में,हौसला भरपूर
सैन्टा तुम आना, इस बार भी ज़रूर
भर लाना अपनी झोली में खुशियों का सुरूर।
दिसम्बर 21, 2011

एक ख़्वाब जिसे मन नहीं समझ रहा

अलसाई हुई आँखों में
एक अक्स उभरता है
देखने पर ध्यान से
वो अर्श ठहरता है
फिर बोझिल सी आँखें
कुछ खुली कुछ मुँदी
स्मृति पटल पर कोई
ख़याल नहीं घूमता।
आख़िर कौन है यह,जिसे
मन नहीं समझ रहा
तमाम कोशिशों पर भी ये
नहीं पिघल रहा
तभी एक सिहरन सी और
आँख कुछ खुली
नज़र गई सीधे अर्श पर
चेहरा न था वहाँ कोई
वो अमावस की रात थी,
नहीं सौगात कोई।
दिसम्बर 19, 2011

शायराना अंदाज़-9

“तन्हाइयों की आदत अब हो गई हमें
तुम्हारा पास आना,अब भाता नहीं
यूं फैले हमारी चाहतों के फासले,
अब किसी चाहत से,कोई नाता नहीं”
दिसम्बर 17, 2011 

Monday, 30 January 2012

मुमकिन होता नहीं

चाहे कोई आपको,आपकी तरह
मुमकिन होता नहीं
सुने अनकहे लफ़्ज़ों के जज़बात
मुमकिन होता नहीं
क्यूँ नहीं ये ज़िंदगी,उन्हें उन से मिलाती
जो पूरे कर सके सारे ख़्वाब
मुश्किल तो नहीं,फिर भी
मुमकिन होता नहीं
न परवाह है कोई,कि चाहे कोई क्या
जब दर्द उठे दिल में,फिर चुप रहना
मुमकिन होता नहीं
शिकायतों का दौर थमता नहीं
फिर भी उसे बयाँ करना
मुमकिन होता नहीं
गहरी सूनी आँखे न जाने क्या-क्या खोजतीं
फिर उन्हे सूखा रख पाना
मुमकिन होता नहीं
गज़ब है ये ज़िंदगी,गज़ब हैं ये चाहते
इनके बिन भी जीना
मुमकिन होता नहीं
ठीक उस तरह जैसे रात के बिना
सुबह का आना
मुमकिन होता नहीं।