अलसाई हुई आँखों में
एक अक्स उभरता है
देखने पर ध्यान से
वो अर्श ठहरता है
फिर बोझिल सी आँखें
कुछ खुली कुछ मुँदी
स्मृति पटल पर कोई
ख़याल नहीं घूमता।
आख़िर कौन है यह,जिसे
मन नहीं समझ रहा
तमाम कोशिशों पर भी ये
नहीं पिघल रहा
तभी एक सिहरन सी और
आँख कुछ खुली
नज़र गई सीधे अर्श पर
चेहरा न था वहाँ कोई
वो अमावस की रात थी,
नहीं सौगात कोई।
दिसम्बर 19, 2011
एक अक्स उभरता है
देखने पर ध्यान से
वो अर्श ठहरता है
फिर बोझिल सी आँखें
कुछ खुली कुछ मुँदी
स्मृति पटल पर कोई
ख़याल नहीं घूमता।
आख़िर कौन है यह,जिसे
मन नहीं समझ रहा
तमाम कोशिशों पर भी ये
नहीं पिघल रहा
तभी एक सिहरन सी और
आँख कुछ खुली
नज़र गई सीधे अर्श पर
चेहरा न था वहाँ कोई
वो अमावस की रात थी,
नहीं सौगात कोई।
दिसम्बर 19, 2011