कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

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Friday, 3 February 2012

रात के जज़बात


सदा तुम्हारा इंतज़ार क्यूँ रहता
वज़ूद क्या नहीं, कोई मेरा
माना कि तुम हो उजली साफ
तो क्या? जीवन नहीं घनेरा
हर आशा को सदा,तुझसे ही
जोड़ा जाता,जबकि
निराश और थके आते हैं सब
सदा,मेरी बाँहों में समाते हैं सब।
समझती उन्हे और हौसला भी भरती
चूम पलकों को झट आगोश में लेती
फिर भी कहते हैं लोग,फ़िक्र न कर
कट जाएगी रात—
आएगी सुबह,ले नई सौगात।
नई सोच को बल,सदा मुझसे
ही मिलता….
न मुझे कोई देखता,न कोई सराहता
जबकि हर जिस्म में,
ऊर्जा भरती हूँ मैं
थपकी मीठी नींद की,उमंग भरती हूँ मैं
हूँ ख़ास तो बहुत, फिर भी…..
क्यूँ रहता सदा तेरा इंतज़ार।
(रात के सवाल हैं सुबह से कुछ ख़ास)

Sunday, 29 January 2012

सुबह के लिए

रात गहरी नींद आई,तुम्हारी मीठी याद में
खुलेगी जब आँख,तुम गले लगाओगी हमें
कैसे हर रोज़ नया रूप धर लेती हो तुम
हो रात कितनी ही घनेरी,मंद कर देती हो तुम।
रात यूँ ख़ामोश जितने ख़्वाब हम जीते रहे
सब को पूरा करने का,हौसला भर देती हो तुम।
गहन अंधकार में,होती हैं जब आँख बंद
चुपके से यँ चूम कर,रौशनी भर देती हो तुम।
हो बला की ख़ूबसूरत,न इसका कोई है जवाब
इतज़ार करते हर दिल में,उमंग भर देती हो तुम।
हर दिन नया है जीवन,हर दिन नई है शुरुवात
गले लगा के रोज़ यूँ,जीवन बदल देती हो तुम…
दिसम्बर 14, 2011