कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

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Sunday, 29 January 2012

सुबह के लिए

रात गहरी नींद आई,तुम्हारी मीठी याद में
खुलेगी जब आँख,तुम गले लगाओगी हमें
कैसे हर रोज़ नया रूप धर लेती हो तुम
हो रात कितनी ही घनेरी,मंद कर देती हो तुम।
रात यूँ ख़ामोश जितने ख़्वाब हम जीते रहे
सब को पूरा करने का,हौसला भर देती हो तुम।
गहन अंधकार में,होती हैं जब आँख बंद
चुपके से यँ चूम कर,रौशनी भर देती हो तुम।
हो बला की ख़ूबसूरत,न इसका कोई है जवाब
इतज़ार करते हर दिल में,उमंग भर देती हो तुम।
हर दिन नया है जीवन,हर दिन नई है शुरुवात
गले लगा के रोज़ यूँ,जीवन बदल देती हो तुम…
दिसम्बर 14, 2011