कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Sunday, 29 January 2012

दीवारें भी बोलती हैं

बंद कमरे में खिड़की के पास
सींखचों से झांकती नज़र
देखती है बाहर
दिखता है कुछ साफ तो कुछ धुंधला सा
खिड़की पर लगी लोहे की छड़ियां,
रुकावट बन रही हैं
पुनः नज़र वापस कमरे में
वही बंद कमरा,वही खामोश दीवारें!
चारों तरफ दौड़ती है नज़र
चाहती है कुछ पूछना
कुछ कहना
पर कमरे में कोई नहीं
तब दीवारें ही तोड़ती हैं-अपना मूकपन
कहती हैं,एकांत का ये क्षण
कर लो अपना मन्थन
निष्पक्ष भाव से
फिर जो प्रश्न उठें तुम्हारे मन में
परिप्रेक्ष्य में उनके-
पूछना तुम हमसे
मिलेगा जवाब इसी खा़मोशी में तुम्हे
क्योंकि दीवारें
खा़मोश नहीं होती,मौन रहती हैं
और-प्रतिक्षण मौन से भी कुछ संदेश
संचरित होते हैं…

अगस्त 31, 2011

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