कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

Friday, 30 March 2012

हरा पत्ता

टूटा हुआ एक पत्ता आज राह में मिल गया,था तो बिल्कुल हरा और नया सा। उसकी उम्र अधिक न थी, शायद
इसी ऋतु में जन्मा था वो। बेहद नर्म बेहद मासूम। देखते ही रो पड़ा नवजात शिशु की भाँति और कहने लगा कि मुझे
भूख लगी है स्नेह की पर मैं तो गिर गया शाख से,अब कैसे जुड़ूँ वापस। मुझे नहीं पता कि मैं खुद गिरा हूँ या कि गिराया गया हूँ लेकिन शाख के बड़े पत्ते मुझसे कह रहे थे कि तू यहाँ नहीं रह सकता, यह शाख हमारी है हम तुझसे अधिक बलशाली हैं। बड़े हैं उम्र में,कद में-पद में भी। तू यहाँ आ तो गया शाख की मर्ज़ी थी पर हम तुझे यहाँ बसने नहीं देंगे,तुझे गिरा देंगें और फिर पता नही शायद मैं सोया था या स्वप्न में,पर जब आँख खुली तो मैंने खुद को ज़मीं पर धूल से लिपटा पाया। हाँ धूल नें मुझे डाँटा नहीं बल्कि गले से लगाया लेकिन मैं तो अपनी शाख को चाहता हूँ और शाख मुझे लेकिन एक बात और मेरी समझ में नहीं आ रही कि शाख ने मुझे गिरने क्यो दिया? क्य शाख उन बड़े पत्तो से कमज़ोर है या कि पत्ते अधिक बलशाली,बात तो एक ही हुई ना…तो फिर? कहीं ऐसा तो नहीं कि शाख को भी मुझसे प्यार नहीं वो भी बस चाहती है उन्ही पुराने पत्तों का साथ।
जीवन चलता रहता है सबका आदि और अन्त है फिर किसी के साथ यह पहले और किसी के साथ बाद में क्यों? हर पत्ते का हक है कि वो शाख पर जन्मे और बढ़े। हरा फिर भूरा फिर सूखा और अन्त में बेरंग सा शाख से अलग हो मुक्त हो जाए। किंतु उस कोमल से हरे पत्ते को तो अभी जीना था,अपना हर रंग। फिर क्यों सिर्फ हरा रंग ही उसकी किस्मत बन गया। अब उसे चाहे जितना सहेजें वो हरा न रह पाएगा,हाँ उसकी रंगत ज़रूर बदलेगी पर न बदलेगा कद-काठी। ख़ामोश हो गया आज वो हरा पत्ता…

Tuesday, 27 March 2012

नसीब से आज दीदार-ए-यार हो गया


नसीब से आज दीदार-ए-यार हो गया
हर क़लमा खिला,खुश गवार हो गया।
रूह से रूह का ऐतबार आज हो गया
जिस्म प्यार का गवह-गार हो गया।
देखा निगाहों ने जी-भर के आज खुद को
निगाहों को यार की पनाहों से प्यार हो गया।
धड़कनें बढ़ने लगीं-साँस तेज़ चल पड़ी
हो गये यार के जब क़ुबूल-ए-इज़हार हो गया।
अब तो इश्क की मुश्क का आलम न पूछो
यार ही मेरा ख़ुदा,ख़ुदा ही प्यार हो गया।
मौला हर आयत पे है नाम तेरा ही खुदा
आ पढ़ ले अब खुद,आयत ही प्यार हो गया।

Tuesday, 20 March 2012

ये हुआ क्या…


न आँधी है कोई,
न ही हवाएँ हैं तेज़
हल्की सी सरसराहट
साथ उड़ा ले गई।
न हुई बारिश कहीं
न बादल ही घिरे
नमी थी ज़रा सी
संग बहा ले गई।
न सर पे हाँथ था कोई
न बाँहो में जकड़ा कोई
फिर भी आत्मा कहीं
गहरे समा ही गई।
न तो शोरगुल था
न घिरी थी ख़ामोशी
तन्हाइयाँ थीं फैली मगर
रूह को हँसा ही गई।
न सोए थे गहरी नींद में
न कोशिश थी जगने की
फिर कैसी जगी आरज़ू
कलम चला ही गई।

Saturday, 17 March 2012

मौत या मुक्ति


सुना था वो चुपके से दबे पाँव आती है
पर बिन बताए साथ ले जाती है,पता न था।
सुना था शरीर जड़वत जिंदा लाश बन जाता है
आत्मा से शरीर को ये खबर न हो,पता न था।
सुना था सुंदर घना वृक्ष भी पल में सूख जाता है
पर इतनी तेजी से कि महसूस ही न हो,पता न था।
आँखों से नमी चली जाती-पथरा जाती हैं वो सुना था
पथराई पुतलियों में हजारों सवाल जिंदा हों,पता न था।
सब कह तो रहे हैं वो आई संग ले गई अपने़
वक्त से पहले ही ले लेगी वो जाँ,पता न था।

Wednesday, 14 March 2012

अपनी ही तलाश में…

जीवन हर पल नया होता है इसलिए इसे किसी भी एक रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। हर दिन के अलग-अलग अनुभव,कभी अच्छे तो कभी बुरे और कभी कुछ खास नहीं,सामान्य। यह तो सभी जानते हैं कि यही उतार-चढ़ाव जीवन का रूप हैं,यही जीवन है पर फिर भी सदा यही समझ नहीं आता कि कौन से रूप को जीवन कहा जाए और यदि ये रूप ही जीवन हैं तो फिर जीवन का अपना अस्तित्व कया है? क्या वो स्वयं अस्तित्वहीन है और अभी वो अपनी ही तलाश में है। अनेकानेक सवाल उपजते हैं मन मे जवाब की तलाश में। अनेकों रूप तो दिखते हैं पर जीवन नहीं कयोंकि इन रूपों की अपनी वजह है,अपना वजूद है अतः ये जीवन नहीं। इनका स्वतंत्र रूप ही इनकी पहचान है और ‘रूप’ में आप सुख-दुख,हास्य-क्रोध,अमीरी-गरीबी जैसी हजारों भावनायें महसूस कर सकते हैं,जिनके आधार पर जीवन के मायने तलाशने लगते हैं-किंतु ‘जीवन’ जिसकी स्वयं की कोई पहचान नहीं उसके मायने ?
‘हम खुश हैं तो जीवन अच्छा हम दुखी जीवन बुरा’यही सब मानते हैं लेकिन अच्छा या बुरा हमसे जुड़ा है जीवन से नहीं फिर इस जीवन के विषय में इतनी चर्चा क्यों,हर ज़ुबाँ पर इसी का नाम क्यों।
शायद! अस्तित्वहीन चीज़ें अपने अस्तित्व की पहचान के लिए अधिक शोर मचाती हैं ताकि कोई तो उन्हें उनकी पहचान एक नाम दिला सके,और जीवन इसमें सर्वोपरि है तभी वो हर रूप,हर बात,हर क्षण खुद को अपनी मौजूदगी बताता है और अपने होने की शिनाख़्त चाहता है। तरस आता है जीवन पर,इसकी तमाम कोशिशों पर जो भटक रही हैं अपनी ही तलाश में… 

Monday, 5 March 2012

औरत की दुश्मन है औरत यहाँ

औरत की दुश्मन है औरत यहाँ
फिर भी औरत ही बेचारी यहाँ।
हर हादसे का मुजरिम
क्या आदमी ही है ?’हाँ’
इल्ज़ाम लगा औरत
बन गई बेगुनाह।
भ्रूण से जन्म तक वो चाहे यही
हो लड़का ही पैदा न लड़की कभी
लड़की जो जन्मी तो कर्ज से भरी
लड़का ले आएगा धन की पोटली
लड़की पराई न काम की किसी
लड़के से जीवन की नईया टिकी
ये सोच,सिर्फ आदमी की नहीं है यहाँ
औरत ही ज़्यादा है स्वार्थी यहाँ।
हैवानियत है मर्दों की चारों तरफ
क्या यही इक पहचान, उनके लिए
बेचारियत है औरतों की चारों तरफ
क्या यही सच्चाई है,उनके लिए ?
हैवानियत का ताज है आदमी के सर
इस पीड़ा को कैसे वो,पिये हर पल
अबला है औरत और मासूम भी
इस आड़ में ही औरत,बेफिक्र यहाँ
न खुद से है प्यार,न खुद की है चाह
है औरत ही दुश्मन,औरत की यहाँ।

Wednesday, 29 February 2012

शाम का वक्त


शाम का वक्त झील का किनारा
स्याह सा पानी,उतरा है दिल में
रूमानियत से भरी हवाएँ चूमती
मद्ध सी किरणें,यूँ लहरों पे पड़ती
समा ही हसीं है न नज़र कहीं हटती।
तीरे पे बत्तखों का इठला के आना
खोल पंख अपने,अदा से झिटक जाना
उफ ये मदहोशियत अजब सा जादू है
देख कर नज़रें,बस!!महसूस करतीं।
इक छोटा सा टुकड़ा बहता खुद आया
पल भर रुका,था कहीं टकराया
फिर इक लहर वो चल पड़ा उधर
इसी में पूरा जीवन नज़र आया।
शाम का वक्त किनारा झील का
संग अपने सुखद अहसास ले आया…