कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

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Tuesday, 20 March 2012

ये हुआ क्या…


न आँधी है कोई,
न ही हवाएँ हैं तेज़
हल्की सी सरसराहट
साथ उड़ा ले गई।
न हुई बारिश कहीं
न बादल ही घिरे
नमी थी ज़रा सी
संग बहा ले गई।
न सर पे हाँथ था कोई
न बाँहो में जकड़ा कोई
फिर भी आत्मा कहीं
गहरे समा ही गई।
न तो शोरगुल था
न घिरी थी ख़ामोशी
तन्हाइयाँ थीं फैली मगर
रूह को हँसा ही गई।
न सोए थे गहरी नींद में
न कोशिश थी जगने की
फिर कैसी जगी आरज़ू
कलम चला ही गई।

Sunday, 29 January 2012

तेरी जुस्तजू

तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू
तुझे न ख़बर हम यूँ,हुए बेख़बर
तेरी चाह में कब यूँ,बीती सहर
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…
देखा कभी जब भी,निगाहों ने हमको
हुआ कुछ हमें था,न तुम्हे है ख़बर
धड़का है दिल फिर से,धड़की हैं साँसें
कैसे कहें तुमसे,हाल ये मगर
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…
आवाज़ तेरी है,हमें ही पुकारे
तुम्ही न समझ हो,न समझो इशारे
दिल चाहे कहना तुमसे,यही बार-बार
तुम हो हमारे हम ही,हैं तुम्हारा प्यार
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…
दिल की इन बातों को तो,समझो कभी
पास आओ ले लें,तुमको आगोश भर
तेरी जुस्तजू है,तेरी आरज़ू
तेरा ही ख़याल है,बस तू ही तू…

सितम्बर 19, 2011