कविता लिखी नहीं जाती,स्वतः लिख जाती है…

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Tuesday, 31 January 2012

गणतंत्र दिवस-तिरसठ वर्ष


पूरे हुए तिरसठ वर्ष आज
हमारी ज़िंदगी के
वो वर्ष,जिनमें साँसें ली हमने
स्वेच्छा से
हर चीज़ है पाई अपनी
इच्छा से।
इन वर्षों में,हम
जिये हैं स्वतंत्रता से
ये निधि है,जो रखनी है
सम्भाल कर
मिली है हमें अपने
दादा-पुरखों से।
उनके खून से सनी न जाने
कितनी गलियाँ
और आहों से भरी हजारों
मुरझाई कलियाँ,
आज नज़र आती हैं हमें।
इन वर्षों में बहुत कुछ
बदल सा गया है..
आज अपने ही पराये के
बागीचे में जा खड़े हैं
क्या यही हमारी नैतिकता के धागे हैं?
ज़रा सी चोट लगी और टूट गए..
इन धागों में लगी,हजारों गाठें
अलग-अलग कर देती हैं एक-एक को
यदि इन गाँठों को हम हटा सकें
थोड़ी भी मानवता ला सकें
जिससे-
आने वालों को इंसानियत सिखा सकें,
बता सकें उन्हे कि देश है क्या
और वतन क्या!
क़ैद का मतलब है क्या,और
आजादी की परिभाषा क्या
यदि,ये अनुभव हम करा सकें
इन नौनिहालों को,तभी
कह सकेंगे कि हाँ..
पूरे किये हमने तिरसठ वर्ष आज
हमारी ज़िंदगी के।
जनवरी 25, 2012